ये दाढ़ियाँ, ये तिलक धारियाँ नहीं चलतीं
हमारे अहद में मक्कारियाँ नहीं चलतीं

क़बीले वालों के दिल जोड़िए मेरे सरदार
सरों को काट के सरदारियाँ नहीं चलतीं

बुरा न मान अगर यार कुछ बुरा कह दे
दिलों के खेल में ख़ुद्दारियाँ नहीं चलतीं

छलक-छलक पड़ीं आँखों की गागरें अक्सर
सम्भल-सम्भल के ये पनहारियाँ नहीं चलतीं

जनाब-ए-‘कैफ़’ ये दिल्ली है ‘मीर’ ओ ‘गालिब’ की
यहाँ किसी की तरफ़-दारियाँ नहीं चलतीं…

बहादुर शाह ज़फ़र की ग़ज़ल 'बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी'

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