जोशना बैनर्जी आडवानी की कविताएँ

आज पोषम पा पर प्रस्तुत हैं जोशना बैनर्जी आडवानी की कुछ कविताएँ। जोशना इन्टर कॉलेज में प्राचार्या हैं और कत्थक व भरतनाट्यम में प्रभाकर कर चुकी हैं। जोशना को कविताएँ लिखना बेहद पसंद है और कविताएँ लिखते वक़्त वे अपने माता-पिता को बहुत याद करती हैं, जो अब दुनिया में नहीं हैं। जोशना से यहाँ जुड़ा जा सकता है!

बू

मैंने एक जगह रुक के डेरा डाला
मैंने चाँद सितारों को देखा
मैंने जगह बदल दी
मैंने दिशाओं को जाना
मैं अब खानाबदोश हूँ
मैं नखलिस्तानों के ठिकाने जानती हूँ
मैं अब प्यासी नहीं रहती
मैंने सीखा कि एक चलती हुई चीटी एक उँघते हुये
बैल से जीत सकती है
मुझे बंद दीवारों से बू आती है

मैं सोई
मैंने सपना देखा कि जीवन एक सुगंधित घाटी है
मैं जगी
मैंने पाया जीवन काँटो की खेती है
मैंने कर्म किया और पाया कि उन्ही काँटो ने
मेरा गंदा खून निकाल दिया
मैंने स्वस्थ रहने का रहस्य जाना
मुझे आरामदायक सपनों से बू आती है

मैं दुखी हुई
लोगो ने सांत्वना दी और बाद में हँसे
मैं रोई
लोगों ने सौ बातें बनाई
मैंने कविता लिखी
लोगो ने तारीफें की
मेरे दुख और आँसू छिप गये
मैं जान गई कि लोगों को दुखों के कलात्मक
ढाँचे आकर्षित करते हैं
मुझे आँसुओ से बू आती है

मैंने बातूनियों के साथ समय बिताया
मैंने शांत रहना सीखा
मैंने कायरों के साथ यात्रा की
मैंने जाना कि किन चीज़ो से नहीं डरना
मैंने संगीत सुना
मैंने अपने आस पास के अंनत को भर लिया
मैं एकाकीपन में अब झूम सकती हूँ
मुझे खुद के ही भ्रम से बू आती है

मैंने अपने बच्चों को सर्कस दिखाया
मुझे जानवर बेहद बेबस लगे
मैंने बच्चों से बातें की
उनकी महत्वकांक्षाओं की लपट ऊँची थी
मैंने उन्हें अजायबगर और पुस्तकालय में छोड़ दिया
अब वे मुझे अचम्भित करते हैं
मैंने जाना कि बच्चों के साथ पहला कदम ही
आधी यात्रा है
मुझे प्रतिस्पर्धाओं से बू आती है

मुझे दोस्तों ने शराब पिलाई
मैंने नक्सली भावों से खुद को भर लिया
मैंने जलसे देखे
मैंने अपना अनमोल समय व्यर्थ किया
मैं खुद ही मंच पर चढ़ गई
मेरे दोस्त मुझपर गर्व करते है
मैंने जाना कि सम्राट सदैव पुरूष नहीं होते
मुझे खुद की आदतों से बू आती है

मुझे कठिनाईयाँ मिली
मैंने मुँह फेर लिया
मैंने आलस बन आसान डगर चुनी
मुझे सुकून ना मिला
मैंने कठिनाईयों पर शासन किया
मेरी मेहनत अजरता को प्राप्त हुई
मैंने देखा कठिनाई अब भूत बन मेरे
पीछे नहीं भागती
मुझे बैठे हुये लोगों से बू आती है

मैंने प्रेम किया
मैंने दारूण दुख भोगा
मैंने अपने प्रेमी को दूसरी औरतों से अतरंगी
बातें करते देखा
मैं जलती रही रात भर
मैंने प्रेम को विसर्जित कर दिया
प्रेम ईश्वर के कारखाने का एक मुद्रणदोष है
प्रेम कुष्ठ रोग और तपैदिक से भी भयंकर
एक दिमागी बीमारी है
मुझे उस पल से बू आती है
जब मैंने प्रेम किया…

आदिवासी प्रेमी युगल

वो झारखंड जिले के संथल से
बत्तीस किलोमीटर दूर ऊसर भूमि
पर वास करती है
आँखो में वहनि सा तेज
सूरत से शतावरी
मंदाकिनी से होंठ
काकपाली सी आवाज़
जंगली पुष्पों के आभूषण पहन
शिलिमुख बन धँस जाती है
नवयुवकों की छाती में

और वो… श्याम वर्ण ओढ़े
जब अपने समुदाय संग
तटिनि पार करता है तो
सुरम्य लगता है
शोभन वाटिका रचने की चाह में
देवों ने आदिवासियों का खेड़ा रचा
आदिवासी मानवों की श्रेणी के
सबसे शिथिल एंव वसुतुल्य
काननवासी हैं

इसी दल में जन्मे दो देहों ने
प्रेम के लावण्य से और चक्षु के
कुरूशिये से फुलकारी बुनी है
उनके पास कोई तकनीकी यंत्र
नहीं जिसमें वो दिन रात प्रेम पुष्कर
में नहान करे वरन् उनकी धरणी ही
एकमात्र सूत है जो दोनों को
समेटता है समीप

दलछाल की चटनी बना
वो अपने प्रेयस को खिलाती है
सबसे छिपकर
और वो उसे भेंट करता है
जंगली बैंगनी पुष्प
जिसे पाकर वो इन्द्राणी सा
इठलाती है
रात्रि जलसे में वे दोनों जब
नृत्य करते है तो चंद्रमा भी
सोलह कलाओं से
परिपूर्ण हो दमकता है

कामदेव के गन्ने के धनुष से
आहत है दोनों
प्रेम के सातों आसमानों के
सबसे ऊपरी तह के बादल पर
विराजित हो विचरण करते हैं
वो अपनी प्रेयसी के लिये
बाँस, टहनी और फूलों से
फूलमहल गणना चाहता है
मोक्षदायिनी देवी की प्रार्थना में
रख आया है मन की बात

और वो खुद को विसर्जित कर
देना चाहती है उसके प्रेम पोखर में
उसके अंतिम स्मृति में
केवल उसके प्रेयस का वास है
हाँ उसका प्रेयस
पीले तपन में
सुरमयी सौम्य ब्यार के समान
छुपी ओट से टकटक करती
परिकल्पना के समान

उन जंगली गुफाओं मे
अंधेरो की आँखे मध्यम
उजाला कर शरण देते हैं
प्रेमी युगल को
उनके पैरों तले लाल मिट्टी
उरवर्क बनकर बेलें खींच देती है
जहाँ वे दोनो
वही प्रणय की शहनाई

वे कभी एक होंगे या नहीं
ये देवों का निषकर्ष
वर्तमान ही उनकी मज़बूत शाखें
जिनपर झूल उनके पेटों में
गिलहरियाँ और तितलियाँ
फर-झड़ करते हैं
एक दूसरे के जालीदार ओट हैं
वे आदिवासी प्रेमी युगल…

बाबा अब किस्से नहीं सुनाते

बाबा के कंठ में ग्रह बसा था
उनके किस्सों में नियाग्रा फौल्स
की उग्रता का भरसक शोध था
काला सागर और बुल्गेरिया
के क्षेत्रफल उनकी हथेलियों
पर आकर ठिठका करते थे
रेलगाड़ी से उठता धुआँ जिन्न
बन जाता था जादू से यकायक
तूफान तानाशाही करते थे
कठठोकरा टकटक करके
संगीत बुन दिया करता था
बेलें मटकती बलखाती हुई
कंचनजंगा चढ़ जाती थीं
कई-कई अरब वर्षों की घड़ी
वक्त की झालर पर ठहरती थी
आलू बुखारे के खेतों मे
जुगनू जासूसी किया करते थे
जैतून के पेड़ पर चाँद
ध्रुवस्वामिनी को ताकता था
सूरज के सारथी गिलहरी
के कोटर में बौने बन
अपनी तनख्वाह गिनते थे
लोहार के कँधे पीटमपीट में
अपना मुँह लटका लेते थे

बाबा अब किस्से नहीं सुनाते
जीवन गढ़ती है ऐसे किस्से
जो बाबा को दोहराते हैं…

नियाग्रा फौल्स और काला
सागर आँखों की गंगोत्री
से जब-जब बहते हैं तो
हौसलों के तूफान अब
भी तानाशाही कर उठते हैं
तलवों की बेलें कंचनजंगा
झटपट चढ़ जाती हैं
ध्रुवस्वामिनी अब भी
नवयौवना है लेकिन चाँद
थोड़ा सा मनचला हो गया है
अंधेरी सुरंगों में जुगनू टौर्च
लिये आगे पीछे चलते हैं
सूरज के नीचे तनख्वाह
गिनते ही तनख्वाह से
सन्यास मिल जाता है
लोहार का लटका हुआ मुँह
देखकर एक और दिन
शान से जीना आ जाता है

एक बच्ची कहीं सोती है
एक औरत कहीं जागती है
पर बाबा अब किस्से नहीं सुनाते

पर्वत और शेरपा

पर्वतो के बदन पर दिखते हैं
असंख्य प्रेम के निशान
पार्थिव पड़ी स्मृतियाँ,
विदा लेते हाथ,
और मुड़े हुये गर्दन
पर्वत ने खुद पर पैर
रखने वाले से तब
प्रेम किया था जब
सैकड़ों लोग फिसल कर
गिरे थे उसके सीने से

शेरपा…
पर्वत पर बड़ी ही
दत्तचित्तता से
चढ़ता उतरता है
पर्वत हर बार इम्तिहान
लेता है, हो जाता है शुष्क
हर बार परछाईयों को
पकड़ लेता है शेरपा
पर्वत के बदन पर पड़े
धब्बे शेरपा के कदमों
की जंगली फितरत है

जब पीड़ायें असहनीय
होती है
सिसकियाँ गुम जाती है
इकठ्ठे हो जाते हैं
मुठ्ठठियों से बने मुक्के
शेरपा सूर्यास्त ओढ़े
नकार देता है पर्वत का
वजूद और गुनगुनाता है
बुद्धम शरणम गच्छामि
शेरपा कभी नहीं हो सकता
हृदयरोग से ग्रस्त

शेरपा के लिये
पर्वत एक आदमकद
आईने के अलावा
कुछ भी नहीं
एक सभ्य शेरपा
असभ्य पर्वत पर
आंदोलित सा,
अधीर सा,
अलसाया रहता है
पर्वत की पसलियों पर
पैर रख शेरपा जीत
लेता है पर्वत को

शेरपा की पसीने की
तरावट में लिपटी है
पर्वत की पथरीली खूशबू
एक चढ़ाई एक नवजीवन
के समान है
हर दिन जन्मता
है शेरपा
और हम जीवन के एक
ही लड़खड़ाहट से
छत्तीछन्न हो जाते हैं

प्रतिदिन, प्रतिपल,
और प्रतिक्षण शेरपा
महिमामंडन छापता है
क्षितिज को थामे
शेरपा शांत है,
शमित है, संतृप्त है
वह पहाड़ों के बदन पर
ढूँढ लेते हैं रैन बसेरा
पर्वत और शेरपा
अभिमंत्रित करते हैं
एक दूजे को

जहाँ शेष होता है
पर्वत का अभिमान
वहाँ से दिखना शुरू
होता है… शेरपा!

■■■

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