“लगे इलज़ाम लाखो हैं कि घर से दूर निकला हूँ
तुम्हारी ईद तुम समझो, मैं तो बदस्तूर निकला हूँ।”

“तुम नहीं सुधरोगे ना? कोई घर ना जा पाने से दुखी है और तुम्हें व्यंग सूझ रहा है। ये नहीं कि झूठा ही सही चाँद मुबारक़ बोल देते, नहीं?”

“उफ़्फ़!! तुम तो बस शुरू हो जाती हो.. उर्दू नहीं देखी तुमने। अरे चाँद और उर्दू का बड़ा गहरा रिश्ता होता है। चाँद मुबारक़ बोलो या उर्दू में एक शेर कह दो, एक ही बात है।”

“तुम ना रहने दो, अपना फ़लसफ़ा अपने पास रखो, आई ऍम गोइंग।”

“अच्छा सुनो… एक बात तो सुनती जाओ…। सुनो तो..”

“बोलो।”

“तुम मुबारक़।।”


Puneet Kusum

नाम पुनीत कुसुम है, पेशे से सॉफ्टवेर इंजीनियर हूँ (जल्दी ही यह बताना बंद करना चाहूँगा) और स्वभाव से एक सामान्य इंसान जो भीतर के द्वंद और अंतर्विरोधों से पीछा छुड़ाने का माध्यम कविताओं को मान बैठा है। हिन्दी में पोस्ट ग्रॅजुयेशन ज़ारी है और अपनी कविताओं से लोगों तक पहुँचने के प्रयास भी। पढ़ने का शौक है और पढ़ते हुए जो रत्न मिल जाते हैं, उनको दुनिया तक पहुँचाने की ललक, और इसीलिए पोषम पा। इसके अलावा किसी विशिष्ट परिचय पर अधिकार नहीं है, जैसे होता जाएगा, बताते जाएँगे। :)

  • Vaishali · July 11, 2016 at 4:00 am

    Bhut khoob…😄

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