वो जब कभी भी मुझसे गली में मिल जाती तो पूछती, “तुम्हारा बच्चा कैसा है?” और मैं यूं ही मज़ाक में बोल बैठता, “नटखट”।

मेरा कोई बच्चा नहीं था उस समय तक। मेरी शादी को चार साल गुज़र चुके थे उस वक़्त तक, पर ये खयाल मेरे दिमाग से गुज़रा भी ना था। इतनी बूढ़ी औरत, जो किसी दूसरे ही युग की नज़र आती थी, के लिए ये सोच से परे था कि कोई शादी टिक भी सकती है बिना शिशु के वैवाहिक जीवन में आये।

मुझे आज भी याद है जिस दिन उषा पहली बार मेरे घर आयी थी, कुछ काम माँगने। मैं काफ़ी छोटा था तब। वो बिल्कुल नई शादी शुदा थी, चेहरे पर मंद-मंद मुस्कान लिए, नकली गहनों से सजी हुई। बात सिर्फ बर्तन धुलने और झाड़ू पोंछा करने की हुई थी, पर वो देर रात तक रुकती और हर काम में हाथ बंटाती।

उसके चेहरे पर टालकम पाउडर उपटा रहता था। वो यही लगभग तीस साल के करीब रही होगी, जिससे पता चलता था कि उसकी शादी कुछ देर में हुई थी। कभी-कभी उषा अपने पिता का ज़िक्र करती कि कितने कष्ट झेलने पड़े थे उन्हें उसकी शादी के लिए। दहेज में एक बड़ी रकम देनी पड़ी थी और कुछ भी बचत शेष ना थी अब।

उषा के अनुसार उसका पति एक ज़िम्मेदार, स्नेही और दयालु व्यक्ति था। जब कभी भी मौका मिले, उषा अपने पति की तारीफ करने में कोई कसर ना छोड़ती। जबकि मेरी माँ उसके पति को पहले से जानती थी: वो एक नीच स्वभाव वाला, निष्ठुर और निश्चित रूप से शराबी था। परन्तु, उषा के लिए तो उसके पति में हर वो अच्छे गुण थे जो एक औरत एक योग्य वर में खोजती है। उषा की भावनाएं आहत ना हो बस यही सोचकर मेरी माँ उसकी हर बात में हां में हां मिला देती। कितना परिपूर्ण था उषा का पति उषा की प्रशंसा में!

परन्तु सत्य पर झूठ का आवरण कितनी देर तक रह सकता है? कुछ ही दिनों में उषा हर रोज़ एक नए घाव के साथ घर आने लगी, कभी चेहरे पर, कभी पीठ पर, तो कभी कंधों पर। किन्तु भारतीय स्त्री के लिए तो उसका पति ही उसका स्वाभिमान होता है, इसलिए वो रोज़ एक नया बहाना बना लेती। कभी वो कहती कि वो सीढ़ी से गिर गई, तो कभी कहती कि उसे नींद में चलने की आदत है और वो अंधेरे में किसी वस्तु से टकरा गई। लेकिन, कभी भी कोई बहाना विश्वसनीय ना होता।

लेकिन कितनी दृढ़ महिला थी वो। वो निःस्पृह मुस्कान, जो उसकी पहचान थी, उसके चेहरे पर यूहीं बरकरार रही।

अब किसी की मुस्कान पर भरोसा हो भी तो कैसे!

एक दिन मेरी माँ ने अपना नियंत्रण खो दिया और वो क्रोध में चिल्ला उठी: “ऐसे व्यक्ति के खिलाफ तुम पुलिस में शिकायत क्यों नहीं करती। हर रोज़ तो तुम्हें वह पीटता है।”

उसकी निःस्पृह मुस्कान से मानो उसके अश्रु युद्ध लड़ने लगे हों, ऐसे रोक रही थी वो अपने अश्रु धार को। युद्ध ही था वो, पर उसके अश्रु जीत ही गए और निकल पड़े उसके खुश्क कपोल की यात्रा करने।

“मैं बांझ हूँ। उसको दोष कैसे दूँ, जब गलती ही अपनी है?” उसने कांपते हुए होंठों से कहा।

इस घटना के बाद मानो वो अदृश्य हो गई और वापस नहीं आई। मैं दसवीं में था तब और तीन दिन बाद मेरी माँ ने मुझे उसे खोजने को कहा। बहुत पता लगाने के बाद मुझे मालूम हुआ कि वो अपने पति का छोड़कर अपने माँ-बाप के घर उनके गांव चली गई थी। मुझे लगा था कि ये सुनने के बाद मेरी माँ बहुत निराश होगी क्योंकि उसे अब कोई नया नौकर खोजना होगा, लेकिन उसने राहत की सांस ली और बोली कि उषा एक बेहतर जीवन के योग्य है।

कई साल गुज़र गए। मैं एक शादी शुदा आदमी था अब। मैं एक छोटे विद्यालय में हिंदी का अध्यापक था और एक संघर्षशील लेखक भी। मैं रोज़ सुबह नहाता और मेरी माँ के लाख कहने पर भी पूजा पाठ ना करता। मेरे कपड़ों पर धूल का एक कण ना होता। मैं अपने बालों को एक किनारे से फाड़ता और ध्यान रखता कि एक बाल भी अस्थिर नजर ना आए। मेरे जूते चमकते रहते। इन सब रोज़ की दिनचर्या के बाद मैं अपनी मोटरबाइक से निकल पड़ता अपने मित्र दिनेश को लेने, जो मेरे साथ उसी विद्यालय में पढ़ाता था।

ये तब की बात है जब मैंने उषा को फिर देखा था इतने दिनों के बाद। वो बहुत बूढ़ी नहीं रही होगी पर चेहरे की झुर्रियां अलग ही कहानी बयान कर रही थीं। वो धीरे-धीरे झुक कर चलने लगी थी। तब पहली बार उसने मुझसे मेरे बच्चे के बारे में पूछा था, जैसे उसे पहले से पता हो कि मेरी शादी हो चुकी थी, और इसके बाद वो अब रोज़ पूछती। लगभग हर बार जब वो मुझसे मिलती।

बाद में दिनेश ने मुझे बताया कि उषा अब उसके घर में काम करती है। वह मेरे घर दोबारा क्यों नहीं आई ये खुद ही स्पष्ट था। अपने पति के नीच व्यवहार से वह स्वयं शर्मसार थी। जब कभी भी वह मुझे दिनेश का इंतजार करते देख लेती वह सीधे मेरे पास आ जाती बातें करने। मैं उसे टालने के बहुत प्रयत्न करता, पर सफल ना होता।

इसके बाद वो एक दिन फिर अदृश्य हो गई। मुझे इसके विषय में महीनों बाद पता चला जब दिनेश ने मुझसे कहा कि वो एक नई नौकरानी ढूंढ रहा है। जब मैंने उषा के बारे में उससे पूछा तो उसने बताया कि वो महीनों से दिखी ही नहीं और ना तो उसकी कोई सूचना थी। मुझे भी कोई चिंता ना हुई, और मैं ये सोचकर सब भूल गया कि वह एक बार फिर अपने माता-पिता के साथ उनके घर चली गई होगी।

इतवार की एक सुबह, मैं अपने घर के विशाल से बरामदे में बेंत की कुर्सी पर बैठा चाय पी रहा था। प्रभात का लाल सूर्य मेरे सामने आकाश चढ़ रहा था, आकाश में लालिमा छा गई थी, छोटे पंछी सामने बौगेंवेलिया के झाड़ में चहचहा रहे थे, जो हर एक चीज़ को जकड़े हुए ऊपर बरामदे तक पहुंच गया था। वह एक शांत और मनोहर सुबह थी।

मैं अभी समाचारपत्र पढ़ने ही बैठा था कि दरवाज़े पर एक ज़ोर की दस्तक हुई। ‘क्या मुसीबत है’, मैं भुनभुनाया, दस्तक के शोर से परेशान होकर। दस्तक तब तक बंद ना हुई जब तक मैंने दरवाजे की कुण्डी खोल ना दी। मैंने सोचा कोई जाना पहचाना चेहरा होगा पर एक अपरिचित आदमी मेरे सामने खड़ा था, जैसे अभी-अभी बिस्तर से उठ आया हो। उसके चेहरे पर कुछ सूजन थी और बाल बिखरे हुए थे।

“सतीश! क्या आप सतीश हैं?” उसने तपाक से पूछा।

“हाँ?” मैंने उत्सुकता से पूछा।

“वो महिला जो आपके घर काम करती थी आपको देखना चाहती है इसी वक़्त। वो मृत्युशय्या पर है। चलो…”, उसने अधिकारपूर्वक कहा।

मैं भीतर अपने कमरे में गया, अपनी जाकिट उठाई और लड़के के साथ निकल पड़ा।

मैं कई तंग गलियों से गुज़रा। गली के किनारे खुले नाले में काला मलजल बदबू के साथ बह रहा था। मुझे घुटन सी हो रही थी। आवारा कुत्तों के मल की बदबू हवा में मिली हुई थी। कहीं किसी कोने भी एक कूड़ेदान ना था। छोटे बच्चों के नाक बह रहे थे और बालों में धूल सनी हुई थी। खेलते हुए बच्चों की हड्डियां उनकी चमड़ी से चिपकी हुई थीं, और उनका दयनीय स्वास्थ्य उनके माता-पिता की दयनीय परिस्थितियों की कहानी कह रहा था। लगभग सारे नंगे बदन ही थे; कपड़ों में या तो बटन नहीं थे या हर जगह से फटे हुए थे। मैंने अपने पूरे जीवनकाल में ऐसे दृश्य नहीं देखे थे। वहां के कुत्ते भी मेरे स्वच्छ वस्त्रों को अपरिचित पाकर गुर्राने लगे थे।

हम एक छोटी सी झुग्गी के सामने रुके। छत के नाम पर एक टूटा-फूटा टिन का शेड था जिसमें अनगिनत छेद थे। ऐसे घर में भयावह-सी वर्षा ऋतु में रहने का सोच कर मैं सिहर उठा।

मैंने झुक कर छोटे से दरवाज़े से घर में प्रवेश किया। वहां उषा मेरे सामने पड़ी हुई थी, जमीन पर, क्योंकि घर में कोई बिस्तर नहीं थी। एक पतली-सी दरी थी, कुछ सामान, कुछ बर्तन और फटे कपड़े। उसका कमरा बिल्कुल नम था। दीवारों पर सीलन थी।

वो वहां स्थिर लेटी हुई थी, लेकिन कुछ देर बाद थोड़ा हिली। अत्यधिक प्रयत्न के बाद उसने अपनी आँखें खोली और मुझे तुरंत पहचान गई। उसकी वैरागी मुस्कान उसके चेहरे पर वापस आ गई।

लेकिन उसने कुछ कहा नहीं, बस इशारा करके अपने पास बुलाया। मैं उसके पास बैठा और उसने अपने तकिए के नीचे से कुछ निकाला। वह एक चमकदार, चाँदी की पायल थी। उसने पायल मेरे हाथों में रखी और कांपते हुए आवाज़ में बोली, “ये तुम्हारे बच्चे के लिए”।

मुझे खुद पर शर्म आई। मैंने कहा- “मैं इसे ले नहीं सकता।”

उसने मुझसे कोई सवाल ना किया। शायद उसे अब पता था क्योंकि उसकी आँखों में आंसू थे।

“इसको वापस मत करो सतीश”, उसने आग्रह किया। “ये मेरा आशीर्वाद है, मेरे बेटे।” वो धीरे से बोली और ज़ोर से मेरा हाथ पकड़ी। उसके कमजोर शरीर में ज़्यादा जान नहीं थी, परन्तु मैंने महसूस किया कि उसकी आत्मा में अजब शक्ति थी।

उस दिन मैंने हृदय से महसूस किया कि बच्चा वास्तव में आशीर्वाद ही है।

अगले दिन मुझे उषा के निधन की सूचना मिली। मुझे किसी ने बताया कि उषा के पति ने उसका दाह संस्कार किया, बस इतना ही किया उसने उषा के लिए।

उषा ये दुनिया छोड़ कर चली गई पर उसका आशीर्वाद मेरे साथ है।

ये छोटी बच्ची उषा जिसने मुझे ये लिखते वक़्त बहुत तंग किया है, अपनी पायल के बिना एक पल नहीं रहती।

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विवेक नाथ मिश्र
Vivek Nath Mishra's short stories have been published by The Hindu, Muse India, The Criterion, Queen mob's Teahouse, Prachya Review and many other magazines. His book 'Birdsongs of Love and Despair' is soon to be released.

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