चीर चुराने वाला चीर बढ़ावे है
ऐसी लीलाओं से जी घबरावे है

जितनी बार बुहारूँ हूँ अपने घर को
उतनी ही साँसों में धूल समावे है

कैसी बेचैनी है देखो बिरवों में
आज हवा फिर किसकी चुगली खावे है

बादल भी अब पानी बाँटे है ऐसे
इस घर सूखा, उस घर जल बरसावे है

बाँचे है ये भीतर तक आखर-आखर
आख़िर दिल को पढ़ना कौन सिखावे है

Previous articleप्रार्थनाएँ
Next articleपास हुए हम हुर्रे-हुर्रे

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here