पिछले दिनों सोशल मीडिया पर एक पोस्ट देखी थी जिसका इशारा इस तरफ था कि जिन विद्यार्थियों ने अपने सम्पूर्ण शैक्षिक जीवन में कभी सामाजिक विज्ञान या अन्य मानवीय प्रवृत्तियों या समस्याओं के अध्ययन को प्रेरित करने वाले विषय नहीं पढ़े, उनमें से ज़्यादातर का, किसी भी सामाजिक और नैतिक विमर्श में दिया गया मत, कितना अवैज्ञानिक होता है। मसलन विज्ञान, गणित या कंप्यूटर साइंस पढ़ता हुआ विद्यार्थी, जाति और लिंग समस्याओं पर उतना ही सोच सकता है, जितना उसे अपने आसपास दिखता है, क्योंकि उसकी परिधि के परे की दुनिया के दरवाजे खोलने का माध्यम आज की हमारी शिक्षा व्यवस्था में नहीं है। या तो सामाजिक विज्ञान पढ़िए या फिर अल्फा, बीटा, गामा में खो जाइए। निस्संदेह यह बात सौ प्रतिशत सही नहीं थी, लेकिन इसमें सोचे जाने के लिए भी कुछ नहीं था, ऐसा भी नहीं है।

ऐसी ही एक खबर यह भी देखने को मिली जिसमें TISS (Tata Institute of Social Sciences) को सोशल साइंसेज का IIT कहा गया और सरकार द्वारा TISS जैसे और संस्थान खोले जाने और उन्हें उन्नत करने की ज़रूरत की तरफ ध्यान दिलाया गया।

ये दोनों खबरें मुझे ‘साइकिल’ पढ़ते हुए याद आईं। ‘साइकिल’ भोपाल की ‘इकतारा – तक्षशिला का बाल साहित्य एवं कला केंद्र’ द्वारा हाल ही में निकाली गयी बच्चों की द्विमासिक पत्रिका है, जिसका पहला अंक मैंने बीते दो दिनों में पढ़ा है। 80 पेजों की इस सुन्दर पत्रिका के प्रत्येक पेज पर छपी कहानी या कविता मुझे यह बताती रही कि ऊपर दी गयी दो खबरें आज के समय में कितनी प्रासंगिक हैं और एक भावी पीढ़ी को आकार देने वाली इस वर्तमान पीढ़ी के लिए कितनी महत्त्वपूर्ण भी। जब मुझे ये खबरें याद आईं तो किसी सवाल की तरह न होकर, एक नए रास्ते की तरह जिन पर चलने का माध्यम मुझे ‘साइकिल’ के रूप में नज़र आया।

Cycle Iktara 1
चित्र साभार: साइकिल (इकतारा)

जब बच्चों का जीवन परीक्षाओं के पहले और बाद के बीच में बंटा नज़र आता है, वहाँ अगर ऐसा साहित्य या कहानियाँ, जैसी ‘साइकिल’ में हैं, उन्हें अंतराल के रूप में मिल जाएँ तो पूर्ण रूप से न सही, हम इस बात को लेकर तो आश्वस्त हो सकते हैं कि बच्चों के एक बच्चे से लेकर ‘मानव’ कहलाने लायक कुछ बन जाने तक की प्रक्रिया का बीजारोपण तो सही हो रहा है। और यह आश्वस्ति मुझे इस पत्रिका के लगभग हर पन्ने पर मिली।

पत्रिका की शुरुआत ‘साइकिल का बस अड्डा’ से होती है, जहाँ बच्चों को केवल कुछ चित्रों के साथ छोड़ दिया गया है। इन चित्रों में बसें हैं, परिवार हैं, बाज़ार हैं, दोस्ती है और साथ ही हैं बसों पर अंकित कुछ गंतव्य- ईस्लामाबाद, लाहौर, ढाका, काठमांडू। इन शहरों की कहानी हम में से जाने कितने लोगों ने अभी भी पूरी तरह से नहीं जानी है और अपने आधे-अधूरे, सुने-सुनाए किस्सों के ज़रिये हम सब इन शहरों की कुछ छवियाँ अपने ज़ेहन में लिए घूमते हैं.. ऐसी छवियाँ जो न तो हमेशा खुशनुमा होती हैं और न हमेशा सच। बच्चे इन शहरों के बारे में अपने मन में आते मासूम सवाल आपसे पूछें या इन सवालों के जवाब खुद अपने ढंग से ढूंढने के लिए प्रेरित हो जाएँ तो कितना अच्छा होगा!

कुछ आगे चलकर ‘गुहेरी’ है जो मुन्नी की आँख में हो गई थी और जिसके इलाज के लिए मुन्नी को पहाड़ को घर आने का न्योता देना था। न्योता तो मुन्नी दे आई और गुहेरी ठीक भी हो गई लेकिन यह क्या? काम होते ही मम्मी ने मुन्नी को दोबारा पहाड़ के पास भेज दिया- उसे जीभ चिढ़ाने के लिए ताकि पहाड़ सचमुच घर न आ जाए। क्या ऐसे काम हम अपने घरों में अपने बच्चों के सामने नहीं करते? वह काम करते वक़्त क्या हम या हमारे बच्चे अपने फायदे या ‘बड़ों की बात माननी चाहिए’ के अलावा कुछ भी सोच पाते हैं? नहीं! लेकिन मुन्नी ने सोचा और क्या खूब सोचा!

मेरा पसंदीदा पन्ना इस पत्रिका का साँठवा पन्ना है जिसमें बच्चों को consent के महत्त्व को समझाने और उसके violate होने की स्थिति में उन्हें अगले कदम के लिए तैयार करने का प्रयास किया गया है, और वह भी इस तरह से कि बच्चे के कोमल मन पर ग्लानि का कोई भाव न उभरे बल्कि उसमें इतना आत्मविश्वास हो कि वह इस स्थिति से सही ढंग से निकल पाए। पृथ्वी को मैदान बनाकर खेलते बच्चे का प्रलोभन में दी गयी चॉकलेट को फुटबॉल जैसे लात मारकर फ़ेंक देने की परिकल्पना अद्भुत है।

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चित्र साभार: साइकिल (इकतारा)

‘आदमी किस तरह का जानवर है?’ से लेकर ‘गाय दूध देती है या उससे दूध ले लिया जाता है?’ जैसे सवाल ‘साइकिल’ में पहियों की तीलियों की तरह घूमते रहते हैं, जिनके जवाब अगर बच्चे खुद खोज निकालें तो वे यह सैर ज़िन्दगी में कभी नहीं भूल पाएंगे!

बच्चों के लिए व्यंग्य, फिल्म समीक्षा, ग़ालिब जैसे कवि से मुलाक़ात, यात्रा-वृत्तांत और इतिहास में खोये व्यक्तित्वों की कुछ विशेष जानकारियों से भरी यह पत्रिका अगर इसी स्वरुप में आगे बढ़ती है तो यह बच्चों और बड़ों दोनों के लिए एक कीमती तोहफे का रूप ले लेगी।

रंगों और बेहतरीन चित्रों से भरी इस सुन्दर और अद्भुत पत्रिका के लिए इकतारा और टीम को बधाई!

सम्पर्क:-

ई मेल: [email protected]
वेबसाइट: www.ektaraindia.in

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पुनीत कुसुम
कविताओं में स्वयं को ढूँढती एक इकाई..!

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