जब बच्चे लम्बी साँस लेकर
मारते हैं किलकारियाँ
तब गौरैया की तरह उड़ता है माँ का मन

जब बच्चों की कोमल हथेलियाँ
छूती हैं मिट्टी
तब बन जाते हैं घरौंदे

जब बच्चों की उँगलियाँ
थामती हैं खड़िया
तब देश की पाटी पर उग आती है घास

जब बच्चे करते हैं जी-भर प्रेम
तब झड़ते हैं शरमाकर
रोहिड़े के फूल

जब बच्चे लहूलुहान पृथिवी पर
बरसाते हैं चुग्गा
तब हिय में हिलोरे लेती है आज़ादी

जब बच्चों के पाँवों में आ जाते हैं बाबा के जूते
और पढ़-लिखकर करते हैं
हुक्मरानों से सवाल
हक़ की बात
तब वे कवि हो जाते हैं या देशद्रोही!

संदीप निर्भय की कविता 'जिस देश में मेरा भोला गाँव है'

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संदीप निर्भय
गाँव- पूनरासर, बीकानेर (राजस्थान) | प्रकाशन- हम लोग (राजस्थान पत्रिका), कादम्बिनी, हस्ताक्षर वेब पत्रिका, राष्ट्रीय मयूर, अमर उजाला, भारत मंथन, प्रभात केसरी, लीलटांस, राजस्थली, बीणजारो, दैनिक युगपक्ष आदि पत्र-पत्रिकाओं में हिन्दी व राजस्थानी कविताएँ प्रकाशित। हाल ही में बोधि प्रकाशन जयपुर से 'धोरे पर खड़ी साँवली लड़की' कविता संग्रह आया है।

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