इन दिनों कोई किसी को अपना दुःख नहीं बताता
हर कोई कुछ छिपाता हुआ दिखता है
दुःख की छोटी-सी कोठरी में कोई रहना नहीं चाहता
कोई अपने अकेलेपन में नहीं मिलना चाहता
लोग हर वक़्त घिरे हुए रहते हैं लोगों से
अपनी सफलताओं से, ताक़त से, पैसे से, अपने सुरक्षा-दलों से
कुछ भी पूछने पर तुरन्त हँसते हैं
जिसे इन दिनों के आम चलन में प्रसन्नता माना जाता है
उदासी का पुराना कबाड़ पिछवाड़े फेंक दिया गया है
उसका ज़माना ख़त्म हुआ
अब यह आसानी से याद नहीं आता कि आख़िरी शोक-गीत कौन-सा था
आख़िरी उदास फ़िल्म कौन-सी थी जिसे देखकर हम लौटे थे

बहुत सी चीज़ें उलट-पुलट हो गयी हैं
इन दिनों दिमाग़ पर पहले क़ब्ज़ा कर लिया जाता है
ज़मीनों पर क़ब्ज़ा करने के लिए लोग बाद में उतरते हैं
इस तरह नयी ग़ुलामियाँ शुरू होती हैं
तरह-तरह की सस्ती और महँगी चमकदार रंग-बिरंगी
कई बार वे खाने-पीने की चीज़ से ही शुरू हो जाती हैं
और हम सिर्फ़ एक स्वाद के बारे में बात करते रहते हैं
कोई चलते-चलते हाथ में एक आश्वासन थमा जाता है
जिस पर लिखा होता है ‘मेड इन अमेरिका’
नये ग़ुलाम इतने मज़े में दिखते हैं
कि उन्हें किसी दुःख के बारे में बताना कठिन लगता है

और वे संघर्ष जिनके बारे में सोचा गया था कि ख़त्म हो चुके हैं
फिर से वहीं चले आते हैं जहाँ शुरू हुए थे
वह सब जिसे बेहतर हो चुका मान लिया गया था, पहले से ख़राब दिखता है
और यह भी तय है कि इस बार लड़ना ज़्यादा कठिन है
क्योंकि ज़्यादातर लोग अपने को जीता हुआ मानते हैं और हँसते हैं
हर बार कुछ छिपाते हुए दिखायी देते हैं
कोई हादसा है जिसे बार-बार अनदेखा किया जाता है
उसकी एक बची हुई चीख़ जो हमेशा अनसुनी छोड़ दी जाती है।

मंगलेश डबराल की कविता 'उस स्त्री का प्रेम'

Book by Mangalesh Dabral:

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