हे गाँव, तुझे मैं छोड़ चला, लाचार भरे इस भादों में।

था एक दिवस जब तेरे इस आँगन में फूली अमराई
था एक दिवस जब मेरे भी मन में झूमी थी तरुणाई
पीपल की फुनगी पर बोली, पंचम स्वर में कोयल काली
मादक मधु-ऋतु के स्वागत में, कोसों तक फैली हरियाली
पावस की मतवाली संध्या, आती अम्बर से उतर-उतर
उन खेतों की पगडंडी पर, वह बैलों की घंटी का स्वर
फिर तीजों का त्यौहार सुखद, सखियों के मादक गीत मधुर
झूलों के मस्त झकोरों पर, जाते उर के अरमान बिखर

तुम इन्द्रपुरी से सुन्दर थे मेरे मरुधर के सुखद ग्राम
तेरे रेतीले धोरों पर उल्लास बिछाती सुबह शाम
किस्मत की मिटी लकीरों से, रे, आज कहाँ वे दिन बीते
जगती के विष की तुलना में, ये जीवन के मधुघट रीते

अरमान सुलगते शोलों से, मानव मन के अवसादों में
हे गाँव, तुझे मैं छोड़ चला, लाचार भरे इस भादों में।

क्या तुझे सुनाऊँ आज सखे! ये पीड़ा के पहचाने हैं
ये दग्ध-हृदय के छाले हैं, ये दर्द भरे अफ़साने हैं
यह ज़ुल्म ज़मीदारों का है, यह धनिकों की मनमानी है
बेकस किसान के जीवन की, यह जलती हुई कहानी है
क्या कभी सुना भी है तुमने? मानव मानव को खाता है
पीकर लोहू चटकार जीभ, फिर हँसकर दाँत दिखाता है
ये ज़मींदार कहलाते हैं, मूँछों पर ताव लगाते हैं
सौ-सौ को साथ डकार जाएँ, पर कभी डकार ना खाते हैं

पर इनको कौन कहे ज़ालिम, ये शोषक सत्ताधारी हैं
इनकी उस ईश्वर के स्वरूप राजा से रिश्तेदारी है
इनकी वह लाल हवेली है, अम्बर में ऊँचा शीश किए
इन कंगालों की कुटिया का जो आँखों में उपहास लिए

वह रात मनाती रंगरलियाँ, मधु-प्यालों के आह्लादों में
हे गाँव, तुझे मैं छोड़ चला, लाचार भरे इस भादों में।

कर्मठ किसान के खेतों पर, आतंक ध्वजा फहराती है
इनके वे टैक्स-लगान देख कर मानवता थर्राती है
‘भूंगे’ का भूत लगा सिर पर, आँखों में क्रूर विनाश लिए
बेदख़ली के बादल छाए, बस महाप्रलय का श्वास लिए
बेगार प्रथा की बाँहों में जीवन की साध सिसकती है
नंगे-भूखों की आँहों में आँखों की आग बरसती है
ये जान सकेंगे कभी नहीं, इस जगती का वैभव क्या है
कोई इनसे जाकर पूछे, दो पैरों का मानव क्या है?

मानव मिट्टी का रोड़ा है, बस, जब चाहा तब तोड़ दिया
मानव टम-टम का घोड़ा है, बस, जब चाहा तब जोड़ दिया
वह नाबदान का कीड़ा है, किलबिल करता है सुबह-शाम
वह पूँछ हिलाता कुत्ता है, अपने मालिक का चिर-ग़ुलाम

वह अपनी हस्ती बेच चुका, अपने मालिक के हाथों में
हे गाँव, तुझे मैं छोड़ चला, लाचार भरे इस भादों में।

पर कौन यहाँ सुनने वाला, वे तो मस्ती में गाते हैं
कंगाल खड़े हैं यहाँ इधर, पर वे मधु-रात मनाते हैं
वे उस दूकान पर जाते हैं, जिस पर यौवन बिकता रहता
पैसे-पैसे के बदले में जो मिट्टी में मिलता रहता
उनके वे काग़ज़ के टुकड़े, उस ज्वाला में जल जाते हैं
बरसों से मिले हुए मोती, उस पानी में घुल जाते हैं
उद्दाम वासना का यौवन, उस धारा में बह जाता है
नारी का नंगा तन झकोर, वह काँप-काँप रह जाता है

फिर भी वे अपनी सत्ता का, कुछ सार जमाने वाले हैं
कंगलों के झूठे टुकड़ों पर, अधिकार जमाने वाले हैं
यह मानव की दुनिया कठोर, यह मानव का संसार विषम
दुर्बल के निर्बल कन्धों पर, दुस्साह जीवन का भार विषम

वह राग बेबसी का उठता, महफ़िल के मधुर निनादों में
हे गाँव, तुझे मैं छोड़ चला, लाचार भरे इस भादों में।

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