वो जहाँ पर मेरी नज़र ठहरी हुई है
वहाँ ग़ौर से देखो तुम
तुम भी वहाँ हो मेरे साथ
मेरे दाएँ हाथ की उँगलियों में
उलझी हुई हैं तुम्हारे बाएँ हाथ की उँगलियाँ
तुम शांत हो, सुकून से भरी तुम्हारी आँखें
एकटक मेरी परछाई पर हैं।

एक नन्ही-सी चट्टान
जो ठीक तुम्हारे पाँव के बग़ल
लेटी है कि खड़ी, कुछ पता नहीं चलता
मगर उसकी सख़्त छाती पर
तुम्हारी आँखों से गिरी शबनम
उससे कह रही है कि
सख़्त होने से दर्द की चुभन कम नहीं होती
वो सुन्न है, ख़ामोश है तुम्हारी तरह।

और वहाँ देखो तुम
जहाँ भीड़ है लाखों चींटियों की
उस मिट्टी के डले के नीचे
कुछ बुदबुदा रही हैं
तुम सुनो!
धूप से बचने के लिए मिट्टी की ओट अच्छी है।

तुम्हारे कभी-कभी रुआँसा होकर
चट्टान होने पर ऐतराज़ है मुझे
मैं मिट्टी का ढेला हूँ
दरिया होकर मुझे मिटा दोगे।

तुम देखो उस नीम को
जिस पर आ बैठा है परिन्दा
अपनी उड़ान से थककर
सोचो! कितना लाया है वो सुकून
पंखों में ही तो नहीं है तमाम आकाश
पत्तियों की ओट में भी होती हैं राहतें।

जब मिलकर लौटेंगे हम घर की तरफ़
दिखाऊँगा तुम्हें राह में बैठा हुआ वो अंधा आदमी
जिसके कासे से उठा ले जाते हैं
लोग बेझिझक गिने-चुने सिक्के
वो भी जानता है ज़िन्दगी
जो लुट गया उस पर मातम कैसा!

तुम आज का ये ख़ामोशी भरा मंज़र याद रखना
ये चट्टान, ये चींटियाँ, ये मिट्टी, ये नीम
ये परिन्दा और वो अंधा आदमी,
उसका कासा, सब याद रखना
और जब तुम समझने लगो ज़िन्दगी
उँगलियाँ छुड़ा लेना, डर मिटा देना
जीना, मैं तब भी तुम्हारे साथ रहूँगा।

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