एक आदमी था, जिसके पास काफ़ी ज़मींदारी थी, मगर दुनिया की किसी दूसरी चीज़ से, सोने की उसे अधिक चाह थी। इसलिए पास जितनी ज़मीन थी, कुल उसने बेच डाली और उसे कई सोने के टुकड़ों में बदला। सोने के इन टुकड़ों को गलाकर उसने बड़ा गोला बनाया और उसे बड़ी हिफ़ाज़त से ज़मीन में गाड़ दिया।

उस गोले की उसे जितनी परवाह थी, उतनी न बीवी की थी, न बच्‍चे की, न ख़ुद अपनी जान की। हर सुबह वह उस गोले को देखने के लिए जाता था— यह मालूम करने के लिए कि किसी ने उसमें हाथ नहीं लगाया! वह देर तक नज़र गड़ाए उसे देखा करता था।

कंजूस की इस आदत पर एक दूसरे की निगाह गई। जिस जगह वह सोना गड़ा था, धीरे-धीरे वह जगह ढूँढ निकाली गई। आख़िर में एक रात किसी ने वह सोना निकाल लिया।

दूसरे रोज़ सुबह को कंजूस अपनी आदत के अनुसार सोना देखने के लिए गया, मगर जब उसे वह गोला दिखायी न पड़ा, तब वह ग़म और ग़ुस्से में जामे से बाहर हो गया।

उसके एक पड़ोसी ने उससे पूछा, “इतना मन क्‍यों मारे हुए हो? असल में तुम्‍हारे पास कोई पूँजी नहीं थी, फिर कैसे वह तुम्‍हारे हाथ से चली गई? तुम सिर्फ़ एक शौक़ ताज़ा किए हुए थे कि तुम्‍हारे पास पूँजी थी। तुम अब भी ख़याल में लिए रह सकते हो कि वह माल तुम्‍हारे पास है। सोने के उस पीले गोले की जगह उतना ही बड़ा पत्‍थर का एक टुकड़ा रख दो और सोचते रहो कि वह गोला अब भी मौजूद है। पत्‍थर का वह टुकड़ा तुम्‍हारे लिए सोने का गोला ही होगा, क्‍योंकि उस सोने से तुमने सोने वाला काम नहीं लिया। अब तक वह गोला तुम्‍हारे काम नहीं आया। उससे आँखें सेंकने के सिवा काम लेने की कभी तुमने सोची ही नहीं।”

यदि आदमी धन का सदुपयोग न करे, तो उस धन की कोई क़ीमत नहीं।

Previous articleज़ेनटैंगल
Next articleऋतु शरद
सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' (21 फरवरी, 1899 - 15 अक्टूबर, 1961) हिन्दी कविता के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक माने जाते हैं। वे जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा के साथ हिन्दी साहित्य में छायावाद के प्रमुख स्तंभ माने जाते हैं। उन्होंने कहानियाँ, उपन्यास और निबंध भी लिखे हैं किन्तु उनकी ख्याति विशेषरुप से कविता के कारण ही है।