यह बात आज भी मुझे हैरत में डालती है कि ख़ासतौर पर ख़ाली बोतलों और ख़ाली डिब्बों से कुँवारे मर्दों को इतनी दिलचस्पी क्यों होती है? मर्दों से मेरा आशय उन मर्दों से है जिनको आमतौर पर शादी में कोई दिलचस्पी नहीं होती। यूँ तो इस क़िस्म के मर्द आमतौर पर सनकी व अजीबोग़रीब आदतों के मालिक होते हैं, लेकिन यह बात समझ में नहीं आती कि उन्हें ख़ाली बोतलों और डिब्बों से क्यों इतना प्यार होता है? परिन्दे और जानवर अक्सर इन लोगों के पालतू होते हैं। यह मिलान समझ में भी आ सकता है कि तनहाई में इनका कोई तो साथी होना चाहिए। लेकिन ख़ाली बोतलें और ख़ाली डिब्बे इनकी क्या दिलजोई कर सकते हैं। सनक और अजीबोग़रीब आदतों की वजह ढूँढना कोई मुश्किल नहीं।

कुदरती ख़्वाहिशों की ख़िलाफ़त ऐसे बिगाड़ पैदा कर सकती है लेकिन इसकी मनोवैज्ञानिक बारीकियों में जाना अलबत्ता बहुत मुश्किल है।

मेरे एक अज़ीज़ हैं। उम्र आपकी इस वक़्त पचास के क़रीब-क़रीब है। आपको कबूतर और कुत्ते पालने का शौक़ है और इसमें कुछ अजीबोग़रीब नहीं। लेकिन आपको मर्ज़ है कि बाज़ार से हर रोज़ दूध की मलाई ख़रीद लाते हैं। चूल्हे पर रखकर उसका रोग़न निकालते हैं और इस रोग़न में अपने लिए अलग से सालन तैयार करते हैं। इनका ख़याल है कि इस तरह खालिस घी तैयार होता है। पानी पीने के लिए अपना घड़ा अलग रखते हैं। उसके मुँह पर हमेशा मलमल का टुकड़ा बँधा रहता है ताकि कोई कीड़ा-मकोड़ा अन्दर न चला जाए मगर हवा बराबर दाख़िल होती रहे। पाख़ाना जाते वक़्त सब कपड़े उतारकर एक छोटा-सा तौलिया बाँध लेते हैं और लकड़ी की खड़ाऊँ पहन लेते हैं। अब कौन इनकी मलाई के रोग़न, घड़े की मलमल, अंग के तौलिये और लकड़ी की खड़ाऊँ के मनोवैज्ञानिक विश्वास का हल करने बैठे?

मेरे एक कुँवारे दोस्त हैं। देखने में बड़े ही नॉर्मल इन्सान। हाईकोर्ट में रीडर हैं। आपको हर जगह से, हर वक़्त बदबू आती रहती है। चुनांचे उनका रूमाल सदा उनकी नाक से चिपका रहता है। आपको ख़रगोश पालने का शौक़ है।

एक और कुँवारे हैं। आपको जब मौक़ा मिले नमाज़ पढ़ना शुरू कर देते हैं। लेकिन इसके बावजूद आपका दिमाग़ बिलकुल सही है। दुनिया की सियासत में आपकी नज़र बहुत गहरी है। तोतों को बातें सिखाने में महारत रखते हैं।

मिलिट्री के एक मेजर हैं-बड़ी उम्र के और दौलतमंद। आपको हुक्के जमा करने का शौक़ है। गुड़गुड़िया, पेचवान, चमोड़े-मतलब कि हर क़िस्म का हुक्का उनके पास मौजूद है। आप कई मकानों के मालिक हैं। मगर होटलों में एक कमरा किराये पर लेकर रहते हैं। बटेरें आपकी जान हैं।

एक कर्नल साहब हैं-रिटायर्ड। बहुत बड़ी कोठी में अकेले दस-बारह छोटे-बड़े कुत्तों के साथ रहते हैं। हर ब्राण्ड की ह्विस्की इनके यहाँ मौजूद रहती है। हर रोज़ शाम को चार पैग पीते हैं और अपने साथ किसी-न-किसी लाडले कुत्ते को भी पिलाते हैं।

मैंने अब तक जितने विवाह-विमुखों का ज़िक्र किया है, इन सबको थोड़ा-बहुत ख़ाली बोतलों और डिब्बों से दिलचस्पी है।

मेरे, दूध की मलाई से खालिस घी तैयार करने वाले अज़ीज़ घर में जब कोई ख़ाली बोतल देखें तो उसे धो-धाकर अपनी अलमारी में सजा देते हैं कि ज़रूरत के वक़्त काम आयेगी। हाईकोर्ट के रीडर जिनको हर जगह, हर वक़्त बू आती रहती है, सिर्फ़ ऐसी बोतलें और डिब्बे जमा करते हैं जिनके बारे में वह अपनी पूरी तसल्ली कर लें कि अब उनसे बू आने की कोई गुंजाइश नहीं है। जब मौक़ा मिले, नमाज़ पढ़नेवाले, ख़ाली बोतलें आबदस्त के लिए और टीन के ख़ाली डिब्बे वजू के लिए दर्जनों की तादाद में जमा रखते हैं। उनके ख़याल के मुताबिक ये दोनों चीज़ें सस्ती और पाकीज़ा रहती हैं।

क़िस्म क़िस्म के हुक्के जमा करने वाले मेजर साहब को ख़ाली बोतलें और ख़ाली डिब्बे जमा करके उनको बेचने का शौक़ है। और रिटायर्ड कर्नल साहब को सिर्फ़ ह्विस्की की ख़ाली बोतलें जमा करने का। आप कर्नल साहब के घर जायें तो एक छोटे साफ़-सुथरे कमरे में कई शीशे की अल्मारियों में आपको ह्विस्की की ख़ाली बोतलें सजी हुई नज़र आयेंगी। पुराने से पुराने ब्राण्ड की ह्विस्की की ख़ाली बोतल भी आपको उनके इस अनुपम संग्रह में मिल जायेगी। जिस तरह लोगों को टिकट और सिक्के जमा करने का शौक़ होता है, उसी तरह उनको ह्विस्की की ख़ाली बोतलें जमा करने और उनकी नुमाइश करने का शौक़ नहीं बल्कि सनक है।

कर्नल साहब का कोई अज़ीज़-रिश्तेदार नहीं। कोई है तो इसका मुझे पता नहीं। दुनिया में एकदम अकेले हैं। लेकिन वह अकेलापन बिलकुल महसूस नहीं करते- दस-बारह कुत्ते हैं। उनकी देखभाल वे इस तरह करते हैं जिस तरह स्नेही बाप अपनी औलाद की करते हैं। सारा दिन उनका इन पालतू हैवानों के साथ गुज़र जाता है। फ़ुर्सत के वक्त अल्मारियों में अपनी चहेती बोतले सँवारते रहते हैं। आप पूछेंगे ख़ाली बोतलें, ये ख़ाली डिब्बे क्यों साथ लगा दिए हैं? क्या यह ज़रूरी है कि एकान्त पसन्द मर्दों को ख़ाली बोतलों के साथ-साथ ख़ाली डिब्बों के साथ भी दिलचस्पी हो? और फिर डिब्बे और बोतलें, सिर्फ़ ख़ाली क्यों? भरी हुई क्यों नहीं? मैं आपसे शायद पहले भी अर्ज़ कर चुका हूँ कि मुझे ख़ुद इस बात की हैरत है। यह और इस क़िस्म के और बहुत-से सवाल अक्सर मेरे दिमाग़ में पैदा हो चुके हैं। कोशिश करने पर भी मैं जवाब हासिल नहीं कर सकता।

ख़ाली बोतलें और ख़ाली डिब्बे ख़ालीपन की निशानी हैं। और ख़ाली की कोई सही समानता एकान्त पसन्द मर्दों से शायद यही हो सकती है कि ख़ुद इनकी ज़िन्दगी में ख़ालीपन हो सकता है लेकिन फिर यह सवाल पैदा होता है कि क्या वे इस रिक्तता को एक और रिक्तता से पूरा करते हैं? कुत्तों, बिल्लियों, ख़रगोशों और बन्दरों के बारे में आदमी समझ सकता है कि वे ख़ाली ज़िन्दगी की कमी एक हद तक पूरी कर सकते हैं, कि वे दिल बहला सकते हैं। नाज़-नखरे कर सकते हैं। दिलचस्प कामों के उपयुक्त हो सकते हैं। प्यार का जवाब भी दे सकते हैं। लेकिन ख़ाली बोतलें और डिब्बे दिलचस्पी का क्या सामान पेश कर सकते हैं?

बहुत सम्भव है आपको नीचे की घटनाओं में इन सवालों का जवाब मिल जाए-

दस वर्ष पहले जब मैं बम्बई गया तो वहाँ एक मशहूर फ़िल्म कम्पनी की एक फ़िल्म लगभग बीस हफ़्तों से चल रही थी- हीरोइन पुरानी थी, लेकिन हीरो नया था जो इश्तहारों में छपी हुई तस्वीरों में नौजवान दिखायी देता था। अख़बारों में उसकी एक्टिंग की तारीफ़ पढ़ी तो मैंने यह फ़िल्म देखी। अच्छी-ख़ासी थी। कहानी ध्यान देने वाली थी। और उस नये हीरो का काम भी इस लिहाज़ से काबिले-तारीफ़ था कि उसने पहली बार कैमरे का सामना किया था।

पर्दे पर किसी एक्टर या एक्ट्रेस की उम्र का अन्दाज़ा लगाना आमतौर पर मुश्किल होता है क्योंकि मेकअप जवान को बूढ़ा और बूढ़े को जवान बना देता है। मगर यह नया हीरो बिना किसी शंका के नौजवान था। कॉलेज के छात्र की तरह तरोताज़ा व चाक-चौबन्द। ख़ूबसूरत तो नहीं था मगर उसके गठे हुए जिस्म का प्रत्येक अंग अपनी जगह सही और उपयुक्त था।

इस फ़िल्म के बाद उस एक्टर की मैंने और कई फ़िल्में देखीं। अब वह मंझ गया था। चेहरे के हाव-भाव का बच्चों जैसा भोलापन उम्र और तजुर्बे की सख़्ती में बदल गया था। उसकी गिनती अब चोटी के कलाकारों में होने लगी थी। फ़िल्मी दुनिया में स्केंडल आम होते हैं। आये दिन सुनने में आता है कि फ़लाँ एक्टर का फ़लाँ एक्ट्रेस के साथ सम्बन्ध हो गया है। फ़लाँ एक्ट्रेस फ़लाँ एक्टर को छोड़कर फ़लाँ डायरेक्टर के पहलू में चली गयी है। लगभग हर एक्टर और एक्ट्रेस के साथ कोई-न-कोई रोमांस जल्दी या देर में लिपट जाता है। लेकिन इस हीरो की ज़िन्दगी जिसका मैं ज़िक्र कर रहा हूँ, इन बखेड़ों से पाक थी। मगर अख़बारों में इसकी चर्चा नहीं थी। अख़बारों ने भूले से भी इस हैरत का इज़हार नहीं किया था कि फ़िल्मी दुनिया में रहकर रामस्वरूप की ज़िन्दगी भौतिक वासनाओं से पाक है।

मुझसे सच पूछिए तो इस बारे में कभी ग़ौर नहीं किया था इसलिए कि मुझे एक्टर और एक्ट्रेसों की निजी ज़िन्दगी से कोई दिलचस्पी नहीं थी। फ़िल्म देखी। उसके विषय में अच्छी या बुरी राय क़ायम की और बस। लेकिन जब रामस्वरूप से मेरी मुलाक़ात हुई तो मुझे उसके बारे में बहुत-सी दिलचस्प बातें मालूम हुईं। यह मुलाक़ात उसकी पहली फ़िल्म देखने के आठ वर्ष बाद हुई। शुरू-शुरू में तो वह बम्बई से बहुत दूर एक गाँव में रहता था। मगर अब फ़िल्मी क्रिया-कलाप बढ़ जाने के कारण उसने शिवाजी पार्क में समुद्र के किनारे एक बीच के दर्जे का फ़्लैट ले रखा था।

उससे मेरी मुलाक़ात उसके फ़्लैट में हुई थी जिसके चार कमरे थे, बावर्चीख़ाने समेत। इस फ़्लैट में जो परिवार रहता था, उसमें आठ प्राणी थे। ख़ुद रामस्वरूप, उसका नौकर जो कि बावर्ची भी था, तीन कुत्ते, दो बन्दर और एक बिल्ली। रामस्वरूप और उसका नौकर अविवाहित थे। बन्दर और एक बन्दरिया दोनों अक्सर जालीदार पिंजरों में बन्द रहते थे। इन आधा दर्जन हैवानों के साथ रामस्वरूप को बहुत मुहब्बत थी। नौकर के साथ भी उसका सलूक बहुत अच्छा था मगर उसमें भावनाओं का दख़ल बहुत कम था। लगे-बँधे काम थे जो नियत समय पर मशीन की-सी बेजान नियमितता के साथ जैसे अपने आप हो जाते थे। इसके अलावा ऐसा मालूम होता था कि रामस्वरूप ने अपने नौकर को अपनी ज़िन्दगी के तमाम तौर-तरीक़ों पर पर्चे लिखकर दे दिए थे जो उसने याद कर लिए थे।

अगर रामस्वरूप कपड़े उतारकर नेकर पहनने लगे तो नौकर फ़ौरन तीन-चार सोडे और बर्फ़ के फ़्लास्क शीशेवाली तिपाई पर रख देता था। इसका यह मतलब था कि साहब रम पीकर अपने कुत्तों के साथ खेलेंगे। और जब किसी का टेलीफ़ोन आएगा तो कह दिया जाएगा कि साहब घर पर नहीं हैं। रम की बोतल या सिगरेट का डिब्बा जब ख़ाली होगा तो उसे फेंका या बेचा नहीं जाएगा बल्कि सावधानी से उस कमरे में रख दिया जाएगा जहाँ ख़ाली बोतलों और डिब्बों के अम्बार लगे हैं। कोई औरत मिलने के लिए आएगी तो उसे दरवाज़े से ही यह कहकर वापस कर दिया जायेगा कि रात साहब की शूटिंग थी इसलिए सो रहे हैं। मुलाक़ात करने वाली शाम को या रात को आए तो उससे यह कहा जाता है कि साहब शूटिंग पर गए हैं। रामस्वरूप का घर लगभग वैसा ही था जैसा कि आम तौर पर अकेले रहने वाले अविवाहित मर्दों का होता है। यानी वह सलीक़ा, करीना और रखरखाव ग़ायब था जो भौतिक आकाँक्षाओं में ख़ास होता है।

सफ़ाई थी मगर उसमें खुर्रापन था। पहली बार जब मैं उसके फ़्लैट में दाख़िल हुआ तो मुझे बहुत अधिक यह महसूस हुआ कि मैं चिड़ियाघर के उस हिस्से में दाख़िल हो गया हूँ जो शेर, चीते और दूसरे हैवानों के लिए निश्चित होता है क्योंकि वैसी ही बू आ रही थी। एक कमरा सोने का था, दूसरा बैठने का, तीसरा ख़ाली बोतलों और डिब्बों का, उसमें रम की वे तमाम बोतलें और सिगरेट के वे तमाम डिब्बे मौजूद थे जो रामस्वरूप ने पीकर ख़ाली किए थे। कोई तरतीब नहीं थी। बोतलों पर डिब्बे, डिब्बों पर बोतलें औंधी-सीधी पड़ी थीं। एक कोने में क़तार है तो दूसरे कोने में अम्बार। गर्द जमी हुई है। और बासी तम्बाकू और बासी रम की मिली-जुली तेज़ बू आ रही है। मैंने जब पहली बार यह कमरा देखा तो बहुत हैरान हुआ। अनगिनत बोतलें और डिब्बे थे। सब ख़ाली।

मैंने रामस्वरूप से पूछा- “क्यों भई, यह क्या सिलसिला है?” मैंने कहा, “यह कबाड़खाना।”

उसने सिर्फ़ इतना कहा, “जमा हो गया है।”

यह सुनकर मैंने बोलते हुए सोचा- “इतना कूड़ा जमा होने में कम से कम सात-आठ वर्ष चाहिए।”

मेरा अन्दाज़ा गलत निकला। मुझे बाद में मालूम हुआ कि उसका यह ज़ख़ीरा पूरे दस वर्ष का था। जब वह शिवाजी पार्क में रहने आया था तो वे तमाम बोतलें उठवाकर अपने साथ ले आया था जो उसके पुराने मकान में जमा हो चुकी थीं।

एक बार मैंने उससे कहा- “स्वरूप, तुम ये बोतलें और डिब्बे बेच क्यों नहीं देते? मेरा मतलब है, अव्वल तो साथ-साथ बेचते रहना चाहिए, पर अब की इतना अम्बार जमा हो चुका है और जंग के कारण दाम भी अच्छे मिल सकते हैं, मैं समझता हूँ तुम्हें यह कबाड़खाना उठवा देना चाहिए।”

उसने जवाब में सिर्फ़ इतना कहा- “हटा दिया यार, कौन इतनी बार बक-बक करे।”

इस जवाब से तो यही ज़ाहिर होता था कि उसे ख़ाली बोतलों और डिब्बों से कोई दिलचस्पी नहीं, लेकिन मुझे नौकर से मालूम हुआ कि अगर उस कमरे में कोई बोतल या डिब्बा इधर का उधर हो जाये तो रामस्वरूप क़यामत बरपा देता था।

औरत से उसे कोई दिलचस्पी नहीं थी। मेरी उससे बहुत बेतकल्लुफ़ी हो गयी थी। बातों-बातों में मैंने कई बार उससे पता किया- “क्यों भाई, शादी कब करोगे?”

और हर बार इस क़िस्म का जवाब मिला- “शादी करके क्या करूँगा?”

मैंने सोचा, ‘वाकई रामस्वरूप शादी करके क्या करेगा? क्या वह अपनी बीबी को ख़ाली बोतलों और डिब्बों वाले कमरे में बन्द कर देगा। या सब कपड़े उतारकर, निकर पहनकर, रम पीकर उसके साथ खेला करेगा?’

मैं उससे शादी-ब्याह का ज़िक्र तो अक्सर करता था मगर दिमाग़ पर ज़ोर देने के बावजूद उसे किसी औरत में रुचि लेते न देख सका।

रामस्वरूप से मिलते-मिलते कई वर्ष बीत गये। इस दौरान कई बार मैंने उड़ती-उड़ती यह बात सुनी कि उसे एक एक्ट्रेस से जिसका नाम शीला था, इश्क़ हो गया है। मुझे इस अफ़वाह पर बिलकुल यक़ीन न आया। अव्वल तो रामस्वरूप से इसकी आशा ही नहीं थी, दूसरे शीला से किसी भी समझ-बूझ वाले नौजवान को इश्क़ नहीं हो सकता था क्योंकि वह इस क़दर बेजान थी कि दिक़ की मरीज़ मालूम होती थी। शुरू-शुरू में जब वह एक-दो फ़िल्मों में आयी थी तो किसी क़दर गवारा थी मगर बाद में तो वह बिलकुल बेकैफ़ और बेरंग हो गयी थी और तीसरे दर्जे की फ़िल्मों के लिए सीमित होकर रह गयी थी। मैंने सिर्फ़ एक बार शीला के बारे में रामस्वरूप से पूछा तो उसने मुस्कुराकर कहा, “मेरे लिए क्या यही रह गयी थी?”

इसी दौरान उसका सबसे प्यारा कुत्ता स्टालिन निमोनिया का शिकार हो गया। रामस्वरूप ने दिन-रात बड़े दिल से उसका इलाज किया मगर वह तन्दुरुस्त न हुआ। उसे उसकी मौत से बहुत सदमा हुआ। कई दिन उसकी आँखें शोकपूर्ण रहीं और जब उसने एक दिन बाक़ी कुत्ते किसी दोस्त को दे दिए तो मैंने ख़याल किया कि उसने स्टालिन की मौत के सदमे के कारण ऐसा किया है। वरना वह इनकी जुदाई कभी सहन नहीं करता। लेकिन कुछ समय के बाद उसने बन्दर और बन्दरिया को भी विदा कर दिया तो मुझे किसी क़दर हैरत हुई। लेकिन मैंने सोचा कि उसका दिल अब और किसी मौत का सदमा सहन करना नहीं चाहता।

अब वह निकर पहनकर रम पीते हुए सिर्फ़ अपनी बिल्ली नरगिस से खेलता था। वह भी उससे बहुत प्यार करने लगी थी। क्योंकि रामस्वरूप का सारा मनोरंजन अब इसी के लिए सीमित हो गया था। अब उसके घर से शेर-चीतों की बू नहीं आती थी। सफ़ाई में कुछ सीमा तक नज़र आने वाला सलीक़ा और करीना भी पैदा हो चला था। उसके चेहरे पर हल्का-सा निखार आ गया था। मगर यह सब कुछ इस क़दर आहिस्ता-आहिस्ता हुआ था कि उसके प्रारम्भिक बिन्दु का पता लगाना बहुत मुश्किल था।

दिन गुज़रते गए। रामस्वरूप की ताज़ी फ़िल्म रिलीज़ हुई तो मैंने उसकी कलाकारी में नयी ताज़गी देखी। मैंने उसे बधाई दी तो वह मुस्कुराया- “लो, ह्विस्की पियो।”

मैंने ताज्जुब से पूछा- “ह्विस्की?” इसलिए कि वह सिर्फ़ रम पीने का आदी था।

पहली मुस्कुराहट को होंठों में ज़रा सिकोड़ते हुए उसने जवाब दिया, “रम पी-पीकर तंग आ गया हूँ।”

मैंने उससे कुछ और न पूछा।

अगले रोज़ जब उसके पास शाम को गया, तो वह कमीज़-पाजामा पहने रम नहीं, ह्विस्की पी रहा था। देर तक हम ताश खेलते और ह्विस्की पीते रहे। इस दौरान मैंने नोट किया कि ह्विस्की का स्वाद उसकी ज़ुबान और तालू पर ठीक नहीं बैठ रहा। क्योंकि घूँट भरने के बाद वह कुछ इस तरह मुँह बनाता था जैसे किसी बिना चखी चीज़ से उसका वास्ता पड़ा हुआ है। चुनांचे मैंने उससे कहा- “तुम्हारी तबियत क़बूल नहीं कर रही ह्विस्की?”

उसने मुस्कुराकर जवाब दिया- “आहिस्ता-आहिस्ता क़बूल कर लेगी।”

रामस्वरूप का फ़्लैट दूसरी मंज़िल पर था। एक दिन मैं उधर से गुज़र रहा था कि देखा नीचे गैराज के पास ख़ाली बोतलों और डिब्बों के अम्बार पड़े हैं। सड़क पर दो छकड़े खड़े हैं जिनमें तीन-चार कबाड़िये उनको लाद रहे हैं। मेरी हैरत की कोई सीमा न रही। क्योंकि यह खज़ाना रामस्वरूप के अलावा और किसका हो सकता था! आप यक़ीन जानिए, उसको जुदा होते देखकर मैंने अपने मन में एक अजीब क़िस्म का दर्द महसूस किया। दौड़ा-दौड़ा ऊपर गया। घण्टी बजायी, दरवाज़ा खुला। मैंने अन्दर दाखिल होना चाहा तो नौकर ने सामान्य रूप से रास्ता रोकते हुए कहा- “साहब, रात शूटिंग पर गये थे इस वक़्त सो रहे हैं।”

मैं हैरत और ग़ुस्से से बौखला गया, कुछ बड़बड़ाया और चल पड़ा। उसी दिन शाम को रामस्वरूप मेरे घर आया, उसके साथ शीला थी। नयी बनारसी साड़ी में सजी हुई-रामस्वरूप ने उसकी तरफ़ इशारा करके मुझसे कहा- “मेरी धर्मपत्नी से मिलो।”

अगर मैंने ह्विस्की के चार पैग न पिए होते तो यक़ीनन यह सुनकर मैं बेहोश हो गया होता। रामस्वरूप और शीला सिर्फ़ थोड़ी देर बैठे और चले गये। मैं देर तक सोचता रहा कि बनारसी साड़ी में शीला किसके समान लग रही थी! दुबले-पतले बदन पर हल्के बादामी रंग की साड़ी-किसी जगह फूली हुई किसी जगह दबी हुई… एकदम मेरी आँखों के सामने एक ख़ाली बोतल आ गयी। बारीक काग़ज़ में लिपटी हुई। शीला बिलकुल ख़ाली औरत थी। लेकिन हो सकता है एक ख़ालीपन ने दूसरे ख़ालीपन को पूरा कर दिया हो।

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सआदत हसन मंटो
सआदत हसन मंटो (11 मई 1912 – 18 जनवरी 1955) उर्दू लेखक थे, जो अपनी लघु कथाओं, बू, खोल दो, ठंडा गोश्त और चर्चित टोबा टेकसिंह के लिए प्रसिद्ध हुए। कहानीकार होने के साथ-साथ वे फिल्म और रेडिया पटकथा लेखक और पत्रकार भी थे। अपने छोटे से जीवनकाल में उन्होंने बाइस लघु कथा संग्रह, एक उपन्यास, रेडियो नाटक के पांच संग्रह, रचनाओं के तीन संग्रह और व्यक्तिगत रेखाचित्र के दो संग्रह प्रकाशित किए।