ख़िलाफ़त

रूपम मिश्रा की कविता ‘ख़िलाफ़त’ | ‘Khilafat’, a poem by Rupam Mishra

हम उसे बुरा नहीं कहेगें साथी!
क्योंकि हमने ही उसे अच्छा कहा था!

वो बारी-बारी से सबको निगलेगा
और हम चुप रहेंगे
क्योंकि उसके पहले कौर पर हमने ही ताली बजायी थी!

वो क्रम से सबके हाथों को तोड़ देगा
हम इसे भी विभिन्न तर्क से वैध कह देंगे
क्योंकि अब हमें कुतर्कों की आदत पड़ गयी है साथी!

वो सब्ज़बाग़ दिखाकर
सत्य को छल से कुचल देगा
हम तब भी वाह-वाह करेगें
क्योंकि अब हमें आँसुओं में
चमकीली ओस देखने की आदत लग गयी है साथी!

उसके भोंडेपन और मसखरी पर
हम ख़ूब गम्भीर चर्चा करेगें
क्योंकि उसकी फ़र्जी आत्ममुग्धता में
हम हमारा अपना आत्माभिमान तृप्त करते हैं साथी!

वो ख़ूब चिल्लाकर पाखण्ड को सत्य कहेगा
हम सब छल जानते हुए भी
मानवता को धकेलकर
अंधआस्थाओं की ओर भागेंगे
क्योंकि चमत्कार होने की घोर लालसा
हमारे मन में अच्छे से जगह बनाकर बैठ गयी है साथी!

वो सबकी कमज़ोर नसों को पकड़कर
ख़िलाफ़त की नस ही काट देगा!

शब्दकोश से विरोध शब्द ही मिट जाएगा!
और हम मन ही मन सोचेगें
पर कहेगें नहीं कि
वो ऐसा खग है, जो अपनी जाति के खगों की भाषा जानता है साथी!

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