बुलाने के लिए कई नाम हैं
जिसे पुकारो बोलता भी है
पर एक नाम ऐसा है जिसे पुकारो तो
सब चौकन्ने हो जाते हैं
सभी सोचते हैं ये नाम मेरे लिए तो नहीं
माँ… माँ… माँ…
ओ लड़के
ओ बेटा
वह मेरी बेटी
कहाँ मर गई हो
माँ माँ माँ कहता जब कोई बच्चा
गली में से निकलता है
सड़क पार करता है
या पहाड़ चढ़ता है
पहाड़ उतरकर आँगन में आ खड़ा होता है
तब माँ एकदम सुबह के गुलाब की तरह
खिल उठती है
दोनों दरवाज़े थामकर देखती है
गलियों में जाते, गुल्ली-डण्डा घुमाते, गिट्टे उछालते
माँ माँ कहकर लिपट जाते हैं
माँ को सब एक तरह से ही बुलाते हैं
मधुरता में नहलाकर, चाव से भरकर
ज़रा-सा डरकर आतुरता से
माँ… माँ… माँ
बछड़ा रम्भाता है बां बां बां
गाय कई बार रस्सी तोड़ने का यत्न करती है
मालिक का कोई डर नहीं रहता
कोई भी उलझन हो, कोई भी ख़ुशी हो, कोई भी उम्र हो
कहता है माँ, माँ कहाँ हो तुम माँ
हाय बाप कोई नहीं कहता।

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पद्मा सचदेव
पद्मा सचदेव (जन्म : 17 अप्रैल 1940) एक भारतीय कवयित्री और उपन्यासकार हैं। वे डोगरी भाषा की पहली आधुनिक कवयित्री है। वे हिन्दी में भी लिखती हैं। उनके कतिपय कविता संग्रह प्रकाशित है, किन्तु "मेरी कविता मेरे गीत" के लिए उन्हें 1971 में साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ। उन्हें वर्ष 2001 में पद्म श्री और वर्ष 2007-08 में मध्य प्रदेश सरकार द्वारा कबीर सम्मान प्रदान किया गया।