ये जो चारों तरफ़ की हवा है
भर गई है उन पैरों की धूल से
जो इस पृथ्वी पर सबसे अकेले हो गए हैं

वे असंख्य लोग हैं
जो हार गए अपनी ही ज़िद से
जीने की लालसा लिए
वे दर-दर भटकते हुए
खोजते रहे
सूखते कण्ठ के लिए बूँद भर पानी
बैठने के लिए बित्ते भर का आसरा

हद है कि वह पानी
न घर में मिला
न हज़ारों मील दूर
किसी चमकदार शहर में
जहाँ समुद्र का किनारा था
जहाँ छल-छल नदी बहती थी
जहाँ सबसे अमीर लोग रहते थे
जहाँ इस देश की संसद थी

वहाँ वे सबसे ग़रीब बनकर
बस जी लेना चाहते थे
तब तक
जब तक कि मौत की हवा
बसन्त में नहीं बदल जाती
हद है कि इतना मौक़ा भी उन्हें नहीं दिया गया

वे कुछ नहीं बचा सके
जो अपनी दुनिया
कंधे पर लादकर
चलने का हौसला रखते थे
जो जानते थे
पत्थर और लोहे को तोड़ने की अचूक कला
वे मनुष्य होकर भी हार गए मनुष्य से

उनके लिए
हर दीवार सबसे मज़बूत सीमेंट से बनी है
हर दरवाज़ा सबसे मज़बूत लोहे का
खिड़कियों से झाँकता है अन्धेरा
जो देखना चाहता है तसल्ली के लिए
कि बस वे चले जाएँ

ये समय इतिहास का सबसे भयानक समय है
जब एक मनुष्य
दूसरे मनुष्य के बच जाने के लिए प्रार्थना नहीं करता
उन्हें मौत के मुँह में जाते देखता है
ठीक उसी तरह जैसे कोई फ़िल्म चल रही हो
जैसे कोई तमाशा शुरू हुआ हो
और ताली बजने वाली हो

ये पृथ्वी अब सोच रही है कि
मैं आख़िर घूम किसके लिए रही हूँ।

शंकरानंद
शंकरानंद जन्म 8 अक्टूबर 1983 नया ज्ञानोदय,वागर्थ,हंस,परिकथा,पक्षधर,कथादेश,आलोचना,वाक,समकालीन भारतीय साहित्य,इन्द्रप्रस्थ भारती,साक्षात्कार, नया पथ,उद्भावना,वसुधा,कथन,कादंबिनी, जनसत्ता,अहा जिंदगी, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर,हरिभूमि,प्रभात खबर आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित। कुछ में कहानियां भी। अब तक तीन कविता संग्रह'दूसरे दिन के लिए','पदचाप के साथ' और 'इनकार की भाषा' प्रकाशित। कविता के लिए विद्यापति पुरस्कार और राजस्थान पत्रिका का सृजनात्मक साहित्य पुरस्कार। कुछ भारतीय भाषाओं में अनुवाद भी। हिन्दवी,पोषम पा, कविता कोश, हिन्दी समय, समालोचन, समकालीन जनमत पर भी कविताएं। संप्रति-लेखन के साथ अध्यापन। संपर्क-shankaranand530@gmail.com