हाय !
कैसी दशा आज
आई है ।
घर-घर में मातम
छाई है ।
वृद्ध-बेबस माता-पिता की
लाचारी है ।
दो टुकड़े रोटी पाने की
आस निरंतर जारी है ।
घर में ही बने शरणार्थी
संतान भोग-विलासी है ।

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आशुतोष पाणिनि
कवि, पर्यावरण-प्रेमी, भेषज-विज्ञानी, लोक-स्वास्थ्य एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता ।

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