पागल स्त्री की चीख़ पर कोई कान नहीं दे रहा है
भटकते लोगों की बड़बड़ाहट का कोई अर्थ नहीं है
संततियाँ पालकों से अधिक ऐप में व्यस्त हैं
भिखारियों के एक झुंड ने
पहचान लिए जाने के डर से चौराहा बदल दिया है
दिहाड़ी मज़दूरों की संख्या हर तरफ़ बढ़ रही है
हर नया महीना किसी नयी जगह में नये अवसर खोजना है

रिहेबिलिटेशन सेंटर की संख्या बजट में फिर बढ़ी है
नयी आयुध योजनाएँ बनायी जा रही हैं
पेंशन बढ़ायी गई, साथ ही टैक्स भी बढ़ाए गए
एक बार बढ़ायी गयी क़ीमतें कभी नीचे नहीं आयी हैं

बढ़ते मॉल्स के साथ थड़ियाँ-खोमचे भी ख़ूब बढ़ रहे हैं
जीएसटी को स्वीकारने के असमंजस में
बढ़ता मनोरंजन टैक्स सहर्ष स्वीकार है

मन्दिर-मस्जिद की चर्चाओं पर रुचि क़ायम है लेकिन
स्वास्थ्य, सुरक्षा व शिक्षा सुविधाएँ घिसे हुए विषय हैं
बलात्कारी व पीड़िता के मध्य उम्र कोई मायने नहीं रखती है
प्रेम व मित्रता अब घटित न होकर
चयनित व आयोजित हैं
जहाँ सख़्त दावे तो बहुत हैं लेकिन कड़ी-सा निबाह कम
सड़क पर बिखरे रंगीन-महंगे पेम्फ़लेट्स के नीचे
पेड़ की जीवित हरी पत्तियाँ फड़फड़ा रही हैं

अपनी जमा कुंठाओं, ग़ुस्से को काग़ज़ पर
उतारकर जब अपने काम पर लौटती हूँ
तो ख़बर सुनती हूँ कि
कुछ नृशंस हत्याएँ व
एक आत्महत्या और हुई है
सार्वजनिक-चर्चाओं में अब उनका
सम्पन्न, विपन्न व संघर्षरत होना ही मुख्य है
हत्यारे सदैव की तरह संदेहास्पद हैं
मैं, तत्क्षण अपने कुनबे व परिचितों को गिनती हूँ

फिर
लम्बी साँस ले बाहर देखती हूँ
तो पृथ्वी की पीठ दिखती है
आकाश की गर्जना बन्द है
हवा सरकना भूल गयी है
पानी का स्वाद तालु पहले ही भूल चुकी है
खुरदुरी ज़मीन पर भी क़दम डोलते हैं

मुझे बार-बार समझाया जाता रहा है कि
सिर्फ़ व सिर्फ़… अपने बारे में सोचकर
मैं भले ही इस तरह की हत्याओं से न बच सकूँ
लेकिन आत्महत्या से बारहा बच सकती हूँ

मैं चीख़कर कहती हूँ
आत्महत्या हो या हत्या
दोनों ही सिर्फ़ व सिर्फ़ …अपने बारे में ही सोचकर की जाती हैं!

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मंजुला बिष्ट
बीए. बीएड. गृहणी, स्वतंत्र-लेखन कविता, कहानी व आलेख-लेखन में रुचि उदयपुर (राजस्थान) में निवास इनकी रचनाएँ हंस, अहा! जिंदगी, विश्वगाथा, पर्तों की पड़ताल, माही व स्वर्णवाणी पत्रिका, दैनिक-भास्कर, राजस्थान-पत्रिका, सुबह-सबेरे, प्रभात-ख़बर समाचार-पत्र व हस्ताक्षर, वेब-दुनिया वेब पत्रिका व हिंदीनामा पेज़, बिजूका ब्लॉग में भी रचनाएँ प्रकाशित होती रहती हैं।