भाईसाब तुम तुर्रमखां नहीं कोई
तुम्हारे जैसे तराशे नक्श फैक्ट्री में बनकर आते हैं
मेरी दुकान पर लाइन से खड़े होकर मुंहबोली रक़म देकर फ्रूट खरीदते हैं
तुमको क्यों पड़ी है मोलभाव करने की
कैशबैक देंगे तुम्हारी ई-वॉलेट पर

तुम हमें ये बताओ कि तुम कौन हो और कहाँ रहते हो
नहीं, नहीं, ये पद और कर्म के ढकोसले नहीं
तुम्हारे फड़फड़ाते दिल की मांसपेशियों के बीच
खून और दिमाग़ को अलग करने वाली पाल पर
तुम्हारी जाँघों की संधि में
तुम्हारे जठर की दीवारों को सुरक्षित रखने वाली ग्रंथियों के मुँह पर
तुम कौन हो?
मैं क्या कहता हूँ कि इधर सीधे सादे लोगाँ की बीच किधर घुस गए!
जेब के कड़े हो क्या?
प्राडक्टिव नहीं होना क्या तुम्हें?

तुम घर जाओ, आर्डर प्लेस करो
बताते हैं तुमको कि अगली चीज़ क्या खरीदनी है!

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आशीष बिहानी
मैं बीकानेर, राजस्थान से हूँ और कोशिकीय एवं आणविक जीव विज्ञान केंद्र से पीएचडी कर रहा हूँ. मेरा कविता संग्रह "अन्धकार के धागे" (हिन्द-युग्म प्रकाशन, २०१५) अमेज़न पर उपलब्ध है. इसके अलावा मेरी कविताएँ कई पत्रिकाओं और ई-पत्रों पर छपीं हैं. https://bhoobhransh.blogspot.com/

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