Tag: Ashish Bihani

Ashish Bihani - Andhkaar Ke Dhaage

सुरसा के मुख से: स्क्रीन

समक्ष खड़े शख्स के शब्दों से भागते हुए उसके चेहरे के उतारों और चढ़ावों पर निगाह सरकाते हुए तुम धीरे-धीरे नीचे आते हो और अन्यमनस्कता को बड़े...
Ashish Bihani - Andhkaar Ke Dhaage

सुरसा के मुख से: भाईसाब

भाईसाब तुम तुर्रमखां नहीं कोई तुम्हारे जैसे तराशे नक्श फैक्ट्री में बनकर आते हैं मेरी दुकान पर लाइन से खड़े होकर मुंहबोली रक़म देकर फ्रूट खरीदते...
Ashish Bihani - Andhkaar Ke Dhaage

सुरसा के मुख से: खड़ताल

सुबह-सुबह वो नहलाये ताज़ातरीन बाल फैलाए खड़ताल बजाती हुई निकलती है गाँव की पहली आँख खुलने से भी पहले पतली कच्ची कीचड़ लदी गलियों के उबकाहट भरे जंजाल...
Ashish Bihani - Andhkaar Ke Dhaage

सुरसा के मुख से: दबोच

एक पथरीले चेहरे वाली आग चबाती है किसी झोंपड़ी को कर्णभेदी शोर के साथ हवाओं को छाती पीटकर ललकारते हुए कोई बाघ गर्दन दबाता है अपने शिकार...
Ashish Bihani - Andhkaar Ke Dhaage

सुरसा के मुख से: बोर

'Sursa Ke Mukh se: Bor', a poem by Ashish Bihani आँखों में रोष भरे वो कोशिश करता है एक चुटकुला सुनाने की और सभा की चुप्पी उसे नागवार...
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