Tag: Shrikant Verma

भटका मेघ

भटक गया हूँ— मैं असाढ़ का पहला बादल! श्वेत फूल-सी अलका की मैं पंखुरियों तक छू न सका हूँ! किसी शाप से शप्त हुआ दिग्भ्रमित हुआ हूँ। शताब्दियों के अंतराल...
Shrikant Verma

बुख़ार में कविता

'Bukhaar Mein Kavita', a poem by Shrikant Verma मेरे जीवन में एक ऐसा वक़्त आ गया है जब खोने को कुछ भी नहीं है मेरे पास— दिन, दोस्ती, रवैया, राजनीति, गपशप,...

दुनिया नामक एक बेवा का शोक-गीत

'Duniya Naamak Ek Bewa Ka Shok Geet', a poem by Shrikant Verma लगभग सड़कों ही सड़कों भागता हुआ बियाबान उल्लुओं का दिवास्वप्न चुकते कलाकारों के शहरों और...
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