वहमी हूँ मैं
हाँ, वहम पाल रखा है,
तुम्हारे होने का
होता है एहसास
तुम्हारे शब्दों का
तुम्हारी छुअन का
जो कहा नहीं तुमने
उन बातों को सुनने का
और ख़ुद, मुस्कुराने का
पता है लाईलाज है यह मर्ज़
कल्पनाओं की अद्भुत दुनिया में
एकांत में
तुमसे वो सब कह देना
जो कभी न कह पाई
सब कितना सहज हो जाता है
इस मर्ज़ में!
पर जानती हूँ
और मानती हूँ
कुछ भी अकारण नहीं होता
इस ब्रह्मांड में।
इस वहम में भी
प्रजनन का बीज
होता है छुपा।
प्रसव की पीड़ा लिए
पैदा हो जाती हैं कुछ कविताएँ
कुछ हँसती, खेलती हैं
कुछ छुप या मर जाती हैं…
किसी के पढ़े जाने के डर से…

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अनुपमा झा
कविताएं नहीं लिखती ।अंतस के भावों, कल्पनाओं को बस शब्दों में पिरोने की कोशिश मात्र करती हूँ।

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