मेरे शरीर का व्याकरण अलग है
सारे वाक्य तितर-बितर हैं
पूर्ण-विराम असमय आ जाता है
भूत वर्तमान भविष्य सब एक से है
जहाँ संधि की ज़रूरत है
वहाँ विच्छेद के अवशेष जड़ित हैं

तुम रोज़ लेकर आते हो साँचे नये
सिखाने मुझे क्या सही है, क्या है ग़लत
कैसे मैं हूँ साधारण, कैसे असाधारण
तुम ये क्यों नहीं कर लेते
तुम वो क्यों नहीं कर लेते
छुपा क्यों नहीं लेते अपना व्याकरण
किसी और के निबन्ध में
किसी व्यावहारिक सम्बन्ध में
या किसी चिड़ियाघर में

मुझे मालूम है मैं हूँ अलग
फिर तुम आ जाते हो
अपने संसार का आईना पकड़े
नॉर्मल होने के पैमाने जकड़े
और फिर लगने लगता है
शायद
मेरे शरीर का व्याकरण नहीं
ग़लत तुम हो—
बिल्कुल ग़लत हो!

एकता नाहर की कविता 'किताबें'

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