1

उपस्थित संकट
और सम्भावित दृश्यों के बीच
सुनसान पड़ी हैं विश्वविद्यालय की सड़कें
उदास बैठा है हर मोड़
और इस साल नहीं खिला अमलतास
पिछले साल की तरह

मोर बेवक़्त बोलता है
कुत्तों ने भौंकना बंद कर दिया है

गूलर टूटकर तोड़ता है पसरी चुप्पी
इन दिनों घासें बढ़ रहीं हैं तेजी से

सरस्वती पुरम की दिशा में
रोज़ डूबता है एकदम लाल सूरज
पहले भी डूबता होगा
देखा नहीं मैंने जैसे आजकल देखता हूँ

लाइब्रेरी जड़वत खड़ी है अपनी जगह
पास में खड़ा एक लैम्प पोस्ट
भुकभुकाकर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है
पार्थ-सारथी के ठीक ऊपर आकाश में
बादलों संग खेल रहा है चाँद
यह आषाढ़ का महीना है

2

शब्द ख़र्च नहीं हो पातें हैं रोज़ के
मैंने लिखना शुरू किया है
तुम कहते थे
मैं नहीं ख़र्च करता शब्द तुम पर
लौटकर आना तुम
भेंट करूँगा तुम्हें
इस बार अपनी डायरी

दिन-भर में कई बार
महामारी के सरकारी आँकड़े देखता हूँ
साथ ही देखता हूँ
आँकड़ा अपने ज़िले का भी
जहाँ फ़िलहाल मैं नहीं, मेरे अपने रहते हैं

सोने की कोशिश में मूँदता हूँ पलकें
कई दृश्य तैरते हैं
जो डूब जाते हैं एक-एक कर
कनपटी को पीटते हुए
‘नींद क्यूँ रात भर नहीं आती’
आज एक अनुचित प्रश्न है

भूख भाषा से बाहर की चीज़ है
जिसे समझती हैं केवल माँ
मृत्यु है एक अविभाजित सत्य
जिसे देखता है मरता हुआ इंसान
जीवन एक संगीत है
जो दम तोड़ते दिख रही है
इन दिनों जगह-जगह
निरुपाय इस समय में मैं
तत्काल भाग जाना चाहता हूँ दुनिया सहित
किसी अच्छे समय में

यह आषाढ़ का महीना है
दृश्य और अदृश्य के बीच
आकाश की तरफ़ एकटक निहारते हुए
मैंने टाँग दिया है ख़ुद को
दीवार पर
एक कैलेंडर की तरह।

Previous articleपंखुरी सिन्हा की किताब ‘प्रत्यंचा’
Next articleसंसद का गीत
गौरव भारती
जन्म- बेगूसराय, बिहार | शोधार्थी, भारतीय भाषा केंद्र, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली | इन्द्रप्रस्थ भारती, मुक्तांचल, कविता बिहान, वागर्थ, परिकथा, आजकल, नया ज्ञानोदय, सदानीरा,समहुत, विभोम स्वर, कथानक आदि पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित | ईमेल- [email protected] संपर्क- 9015326408