आठ आषाढ़ गया
मृगशिरा ने लिखा ख़त
आर्द्रा को

वो आना चाहती है
हमारे खेत, हमारे घर

उसे चाहिए मंज़ूरी हमसे
हम तपे हुए हैं, पिघलते हैं, परेशान हैं
पर नहीं है रज़ामंद

हमारे धुओं का वेग
काटता है
पूर्वी हवाओं के वेग को

पर, कई हैं आसरे में
कहते हैं
तुम आ सकती हो
पहाड़ियों को पार कर
बादलों को ओढ़कर
मूसलाधार

कई दरवाज़े बंद हैं
कई स्वागत को आतुर
उठती है वह
बंगाल की खाड़ी से
इतराकर, इठलाकर, देर-सबेर
सारे शिकवे भुलाकर
कजरी गा-गाकर
आती है घनघोर
खोल जाती है सभी के किवाड़!

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विशेष चंद्र ‘नमन’
विशेष चंद्र नमन दिल्ली विवि, श्री गुरु तेग बहादुर खालसा कॉलेज से गणित में स्नातक हैं। कॉलेज के दिनों में साहित्यिक रुचि खूब जागी, नया पढ़ने का मौका मिला, कॉलेज लाइब्रेरी ने और कॉलेज के मित्रों ने बखूबी साथ निभाया, और बीते कुछ वर्षों से वह अधिक सक्रीय रहे हैं। अपनी कविताओं के बारे में विशेष कहते हैं कि अब कॉलेज तो खत्म हो रहा है पर कविताएँ बची रह जाएँगी और कविताओं में कुछ कॉलेज भी बचा रह जायेगा। विशेष फिलहाल नई दिल्ली में रहते हैं।

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