“तुम ऐसे खाते हो? मैं तो काट के खाती हूँ। ऐसे गँवार लगते हैं और मुँह भी गन्दा हो जाता है और पब्लिक में तो ऐसे खा ही नहीं सकते। तुम न जाने कैसे…।
अच्छा तुमने अपनी लाइफ में कितनी तरह के खाये हैं अब तक?
यू नो मैं एक बार एक फेस्टिवल में गयी थी दिल्ली के, इतनी वेरायटीज थीं न वहां!! और पता है कॉम्पिटेशन भी हुआ था वहां एक मिनट में सबसे ज़्यादा खाने का। मैं जीत तो नहीं पायी लेकिन बाय गॉड मज़ा आ गया था उस दिन।
तुम कुछ बोलोगे नहीं? तुमने सुना भी मैंने जो कहा या मैं पागल ही बैठी हूँ यहाँ? तुम्हारा ध्यान ही नहीं है मेरी तरफ! अब कुछ बोलोगे या मैं जाऊँ?”

“देखो, तुम मेरे लिए ख़ास हो, पर ‘आम’ से ज़्यादा नहीं”।


Puneet Kusum

नाम पुनीत कुसुम है, पेशे से सॉफ्टवेर इंजीनियर हूँ (जल्दी ही यह बताना बंद करना चाहूँगा) और स्वभाव से एक सामान्य इंसान जो भीतर के द्वंद और अंतर्विरोधों से पीछा छुड़ाने का माध्यम कविताओं को मान बैठा है। हिन्दी में पोस्ट ग्रॅजुयेशन ज़ारी है और अपनी कविताओं से लोगों तक पहुँचने के प्रयास भी। पढ़ने का शौक है और पढ़ते हुए जो रत्न मिल जाते हैं, उनको दुनिया तक पहुँचाने की ललक, और इसीलिए पोषम पा। इसके अलावा किसी विशिष्ट परिचय पर अधिकार नहीं है, जैसे होता जाएगा, बताते जाएँगे। :)

2 Comments

  • Ujjwal Bhadana · September 30, 2017 at 1:16 pm

    aam ne kahani ko khaas bana diya..

      Puneet Kusum · October 1, 2017 at 10:38 pm

      ‘Aam’ hai hi khaas!! Padhne ke lie shukriya, Ujjwal 🙂

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