अबकी आषाढ़
पचीसों पसेरी
अक्षर बोये थे
सावन के पानी में
उन्नत शब्दों के
अंकुर फूटे हैं
अपनी प्रेम धरा पर
उत्तम काव्य पौध
रोपने के जतन करो
व्यवधानों के
खर-पतवार उगेगें
वक़्त के कीट-पतंगे भी कुतरेंगे
तुम धीरज की
औषधि का आयुष
छिड़क लेना
चौमासे का तर्पण कर
कुँआर में गीतों की कलियाँ
जब कोमल धुन गायेंगीं
नज़्मों के दानों से बाली भर जायेंगीं
पककर झुकती कविताओं से
जब काव्य कलश भर जायेगा
तब कार्तिक के जाड़े में
तुम फिर अपनी प्रीति भूमि पर
भरे कलश की बारहखड़ी बिछा देना
खुद को खुद में उगने देना
शब्दों के श्रेष्ठ तरु वंश खिलेंगे
और काव्यों का उत्कृष्ट फलेगा
© मनोज मीक

