किताब: ‘ए मिरर्ड लाइफ़’ – रविसंकर बाल
रिव्यू: तसनीफ़ हैदर

‘ए मिरर्ड लाइफ़’ रविसंकर बाल की लिखी हुई मौलाना रोम की एक ख़ूबसूरत और छोटी-सी बायोग्राफ़ी है। जो बात इस किताब को ख़ूबसूरत बनाती है वो चौदहवीं सदी में इब्न ए बतूता नामी मशहूर सय्याह के ज़रिये तुर्की के शहर क़ोनिया का दीदार और वहाँ की गलियों और घरों, तहज़ीब और खाने, लिबास वग़ैरह का बयान है। किताब में मौलाना रोम की ज़िन्दगी के हालात काफ़ी पन्नों को लिखने के बाद बयान होना शुरू हुए हैं। उससे पहले मसनवी और मौलाना के बारे में मौजूद बहुत-सी बातों और ग़लत-फ़हमियों का ज़िक्र किया गया है। किताब में मौलाना की ज़िन्दगी में, उन्हें देखने वाले कुछ बुज़ुर्गों के ज़रिये इस बात पर इब्न ए बतूता द्वारा बहस करायी गयी है कि क्या मौलाना और शम्स तबरेज़ के बीच में रूहानी के साथ-साथ जिस्मानी रिश्ता भी था? यूनान से ईरान का सफ़र करने वाले इस अफ़लातूनी तसव्वुफ़ के बारे में किसे ख़बर नहीं जहाँ लड़के और आदमी के हुस्न को आदमियों द्वारा ख़ूब बघारा गया है और अरब के अबू नुवास से हिन्दुस्तान के माधव लाल हुसैन तक ऐसे कई क़िस्से हमें पढ़ने को मिल जाते हैं। ख़ुद दिल्ली के शेख़ निज़ामुद्दीन औलिया और अमीर ख़ुसरौ के बारे में बहुत-सी बातें मशहूर हैं। ख़ास तौर पर निज़ामुद्दीन औलिया का ये जुमला कि अगर शरीअत इजाज़त देती तो मैं और ख़ुसरौ एक ही क़ब्र में दफ़्न होते।

अब इन बातों के सच-झूठ को इन पर रिसर्च करने वाले जानें। मगर मेरा ख़याल है कि रविसंकर बाल के इस मुख़्तसर से नॉविल को रूमी की मुकम्मल बायोग्राफ़ी न समझा जाए और इसके लिए उर्दू में लिखा हुआ ‘क़ाज़ी सज्जाद हुसैन’ का मसनवी मौलाना रोम का दीबाचा ज़रूर पढ़ लिया जाए। जिसमें उन्होंने मौलाना के तअल्लुक़ से मशहूर बहुत-सी सच्ची-झूठी बातों पर विस्तार से बात की है।

ख़ैर! रविसंकर बाल का ये नॉविल असल में बांग्ला ज़बान में लिखा गया है और अंग्रेज़ी में इसे अरुणव सिन्हा ने ट्रांसलेट किया है। किताब के शुरूआती हिस्से में ‘आज़ाद बख़्त’ नाम के जिस बादशाह की अधूरी कहानी बयान की गयी है वो दरअसल, इज़्ज़ातुल्लाह बंगाली की ‘क़िस्सा ए चहार दरवेश’ (फ़ारसी) के उर्दू तर्जुमे ‘बाग़ ओ बहार’ (मीर अम्मन दहलवी) में आप पढ़ सकते हैं। इस हिस्से में भी उस दौर के तुर्किस्तान में मदरसों और तालीम के निज़ाम को ख़ूबी से बयान किया गया है। जो लोग इस मुआमले में ज़्यादा दिलचस्पी रखते हैं उन्हें इब्न ए बतूता का ‘सफ़र-नामा’ भी पढ़ लेना चाहिए जो कि उर्दू के साथ-साथ हिन्दी और अंग्रेज़ी में भी आसानी से मिल जाना चाहिए।

मौलाना रोम या रूमी की ज़िन्दगी, उनके शागिर्द हसामुद्दीन से उनकी मोहब्बत, उनकी पत्नियों और बच्चों की ज़िन्दगी और साथ ही साथ शम्स तबरेज़ और मौलाना के रिश्तों पर इस किताब में अच्छी तरह रौशनी डाली गयी है। किताब आपको पढ़नी चाहिए और कम से कम ये तो जानना ही चाहिए कि बहुत-सी बातों में से चुनकर मौलाना की ज़िन्दगी की जिन बातों को आधार बनाकर ये कहानी लिखी गयी है, वो इसे वाक़ई इस मानी में पुर-कशिश बनाती है कि इससे आम तौर पर मौलाना के दूसरे जीवनी लेखक बचते रहे हैं। यानी शम्स तबरेज़ी के क़त्ल होने का क़िस्सा, जिसमें मौलाना उनकी चीख़ सुनकर भी ख़ामोश और मगन बैठे रहते हैं। इसी तरह शम्स तबरेज़ी की ख़्वाहिश पर अपनी जवान बेटी को उनसे बियाह देना, और रातों में उन दोनों की ख़्वाबगाह में जाकर पति-पत्नी के बीच लेट जाना। उनकी बेटी का अपनी मोहब्बत से बिछड़कर एक गहरे ग़म का शिकार होकर मौत के गहरे समुन्दर में उतर जाना।

सबसे दिलचस्प बात ये है कि अंग्रेज़ी में इस किताब को पढ़ते वक़्त बार-बार मुझे ख़याल आ रहा था कि इसका उर्दू तर्जुमा पढ़ना भी शानदार तजरबा होगा, फिर मैंने मालूम किया तो पता चला कि उर्दू के मारूफ़ शायर ओ अदीब इनआम नदीम, जिन्होंने रविसंकर बाल की मशहूर किताब ‘दोज़ख़नामा’ का उर्दू तर्जुमा किया है वो इस किताब के तर्जुमे का भी काम तक़रीबन पूरा कर चुके हैं। हालांकि अभी ये किताब मुझे मिली नहीं, मगर जब भी दस्तयाब होगी, ज़रूर उनकी इजाज़त से आप सबके साथ अदबी दुनिया चैनल के ज़रिये शेयर करने की कोशिश करूँगा। तब तक आप भी चाहें तो इस किताब को अंग्रेज़ी में पढ़ लीजिए।

शुक्रिया।

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तसनीफ़
तसनीफ़ ने जामिआ मिल्लिया इस्लामिया से एम. ए. (उर्दू) किया है, और अब दिल्ली यूनिवर्सिटी से एम. फिल. कर रहे हैं । साथ ही तसनीफ़ एक ब्लॉगर भी हैं। उनका एक उर्दू ब्लॉग 'अदबी दुनिया' है, जिसमें पिछले दो वर्षों से उर्दू-हिंदी ऑडियो बुक्स पर उनके यूट्यूब चैनल 'अदबी दुनिया' के ज़रिये काम किया जा रहा है।