आज पहली बात पहली रात साथी

चाँदनी ओढ़े धरा सोयी हुई है
श्याम अलकों में किरण खोयी हुई है
प्यार से भीगा प्रकृति का गात साथी
आज पहली बात पहली रात साथी

मौन-सर में कंज की आँखें मुँदी हैं
गोद में प्रिय भृंग हैं, बाहें बँधी हैं
दूर है सूरज, सुदूर प्रभात साथी
आज पहली बात पहली रात साथी

आज तुम भी लाज के बंधन मिटाओ
ख़ुद किसी के हो चलो अपना बनाओ
है यही जीवन, नहीं अपघात साथी
आज पहली बात पहली रात साथी!

Book by Bharat Bhushan: