भंगन

‘Bhangan’, a story by Saadat Hasan Manto

“परे हटिये…”

“क्यों?”

“मुझे आपसे बू आती है।”

“हर इन्सान के जिस्म की एक ख़ास बू होती है… आज बीस बरसों के बाद तुम्हें इससे नफ़रत क्यों महसूस होने लगी।”

“बीस बरस… अल्लाह ही बेहतर जानता है कि मैंने इतना लम्बा अर्सा कैसे बसर किया।”

“मैंने कभी आपको इस अर्से में तकलीफ़ पहुँचायी?”

“जी, कभी नहीं।”

“तो फिर आज अचानक आपको मुझसे ऐसी बू क्यों आने लगी, जिससे आपकी नाक जो माशा अल्लाह काफ़ी बड़ी है इतनी आक्रोशित हो रही है।”

“आप अपनी नाक तो देखिये… पकौड़ा-सी है।”

“मैं इससे इनकार नहीं करता… पकौड़े, तुम जानती हो मुझे बहुत पसन्द हैं।”

“आपको तो हर वाहियात चीज़ पसन्द होती है… कूड़े-करकट में भी आप दिलचस्पी लेते हैं।”

“कूड़ा-करकट हमारा ही तो फैलाया होता है… उसमें आदमी दिलचस्पी क्यों न ले… और तुम जानती हो आज से दस साल पहले जब तुम्हारी हीरे की अँगूठी गुम हो गयी थी तो उसी कूड़े के ढेर से मैंने तुम्हें तलाश करके दी थी।”

“बड़ा करम किया था आपने मुझ पर।”

“भई करम का सवाल नहीं… फ़ारसी का एक शे’र है—

ख़ाक रां राब हिक़ारत मगर
तू चः दानी कि दरी ग़िर्द सवार-ए-बाशद”

“मैं ख़ाक भी नहीं समझी।”

“यही वजह है कि तुमने अभी तक मुझे नहीं समझा… वरना बीस बरस एक आदमी को पहचानने के लिए काफ़ी होते हैं।”

“इन बीस बरसों में आपने कौन-सा सुख पहुँचाया है मुझे?”

“तुम दुख की बात करो… बताओ मैंने कौन-सा दुख तुम्हें इस अर्से में पहुँचाया?”

“एक भी नहीं।”

“तो फिर यह कहने का क्या मतलब था… इन बीस बरसों में आपने कौन-सा सुख पहुँचाया है मुझे?”

“आप मेरे क़रीब न आइये… मैं सोना चाहती हूँ।”

“इस गुस्से में नींद आ जायेगी तुम्हें?”

“ख़ाक आयेगी… बहरहाल… आँखें बन्द करके लेटी रहूँगी और…”

“और क्या करेंगी?”

“लेटी उस रोज़ पर आँसू बहाऊँगी जब मैं आपके पल्ले बाँधी गयी।”

“तुम्हें याद है वह दिन क्या था… सन् क्या था… वक़्त क्या था?”

“मैं कभी वह दिन भूल सकती हूँ… ख़ुदा करे वह किसी लड़की पर न आये।”

“तुम बता तो दो… मैं तुम्हारी याददाश्त का इम्तिहान लेना चाहता हूँ।”

“अब आप मेरा इम्तिहान क्या लेंगे… परे हटिये… मुझे आपसे बू आ रही है।”

“भई हद हो गयी है… तुम्हारी इतनी लम्बी नाक जो कहीं ख़त्म होने ही में नहीं आती, इसको आख़िर क्या हो गया है… मुझसे तो इसको बड़ी भीनी-भीनी ख़ुशबू आनी चाहिए… तुमने मुझसे इन बीस बरसों में हज़ारों मर्तबा कहा कि आप जब किसी कमरे में हों और वहाँ से निकल जायें तो मैं पहचान जाया करती हूँ कि आप वहाँ आये थे।”

“आप झूठ बोल रहे हैं।”

“देखो… मैंने अपनी ज़िन्दगी में आज तक झूठ नहीं बोला… तुम मुझ पर यह इल्ज़ाम न धरो।”

“वाह जी वाह, बड़े आये हैं आप कहीं के सच्चे… मेरा सौ रुपये का नोट आपने चुराया और साफ़ मुकर गये।”

“यह कब की बात है?”

“दो जून सन् उन्नीस सौ बयालीस की… जब सलमा मेरे पेट में थी।”

“यह तारीख़ तुम्हें ख़ूब याद रही।”

“क्यों याद न रहती। जब आपसे मेरी इतनी ज़बर्दस्त लड़ाई हुई थी। मैं अन्दर कमरे में पड़ी थी। आपने चाबी बड़ी सफ़ाई से मेरे तकिये के नीचे से निकाली। दूसरे कमरे में जाकर अलमारी खोली और उसमें जो सात सौ पड़े थे। उनमें से एक नोट उड़ाकर ले गये। मैंने जब दो-ढाई घंटों के बाद उठकर देखा तो आपसे तकरार हुई। मगर आप थे कि ‘परों’ पर पानी ही नहीं लेते थे। आख़िर मैं ख़ामोश हो गयी।”

“यह दो जून सन् उन्नीस सौ बयालीस की बात है… आजकल सन् चव्वन चल रहा है। अब उसके ज़िक्र का क्या फ़ायदा?”

“फ़ायदा तो हर हालत में आप ही का रहता है… मेरी एक नीलम की अँगूठी भी आपने ग़ायब कर दी थी, लेकिन मैंने आपसे कुछ नहीं कहा था।”

“देखो मैं तुम्हारी जान की क़सम खाकर कहता हूँ। उस नीलम की अँगूठी के बारे में मुझे कुछ मालूम नहीं।”

“और उस सौ रुपये के नोट के बारे में।”

“अब तुम्हारी जान की क़सम खायी है तो सचमुच बताना ही पड़ेगा… मैंने… मैंने चुराया ज़रूर था, मगर सिर्फ़ इसलिए कि उस महीने मुझे तनख़्वाह देर से मिलने वाली थी और तुम्हारी सालगिरह थी। तुम्हें कोई तोहफ़ा तो देना था। इन बीस बरसों में तुम्हारी हर सालगिरह पर मैं अपनी सामर्थ्य के मुताबिक़ कोई न कोई तोहफ़ा पेश करता रहा हूँ।”

“बड़े तोहफ़े… उपहार दिये हैं आपने मुझे।”

“नाशुक्री तो न बनो।”

“मैं कई दफ़ा कह चुकी हूँ, आप परे हट जाइये… मुझे आपसे बू आती है।”

“किसकी?”

“यह आपको मालूम होना चाहिए।”

“मैंने ख़ुद को कई मर्तबा सूँघा है, मगर मेरी पकौड़ा जैसी नाक में ऐसी कोई बू नहीं घुसी जिस पर किसी बीवी को एतराज़ हो सके।”

“आप बातें बनाना ख़ूब जानते हैं।”

“और बातें बिगाड़ना तुम… मेरी समझ में नहीं आता आज तुम इस क़दर नाराज़ क्यों हो।”

“अपने गरेबान में मुँह डालकर देखिये।”

“मैं इस वक़्त क़मीज़ पहने नहीं हूँ।”

“क्यों?”

“सख़्त गर्मी है।”

“सख़्त गर्मी हो या नर्म… आपको क़मीज़ तो नहीं उतारनी चाहिए थी। यह कोई शराफ़त नहीं।”

“मोहतरमा! आपने भी तो क़मीज़ उतार रखी है… अपने नंगे बदन को देखिये।”

“ओह… यह मैंने क्या वाहियातपन किया है।”

“यह वाहियातपन तो आप गर्मियों में बीस बरस से कर रही हैं।”

“ख़ैर झूठ बोलना तो हर मर्द की आदत होती है। आप मुझसे दूर ही रहें।”

“क्यों?”

“तौबा… लाख बार कह चुकी हूँ कि मुझे आपसे बहुत गन्दी बू आ रही है।”

“पहले सिर्फ़ बू थी… अब गन्दी हो गयी।”

“ख़बरदार, जो आपने मुझे हाथ लगाया।”

“इस क़दर बेज़ारी आख़िर क्यों?”

“मैं अब आपसे बिल्कुल बेज़ार हो चुकी हूँ।”

“इन बीस बरसों में तुमने कभी ऐसी बेज़ारी का इज़हार नहीं किया था।”

“अब तो कर दिया है।”

“लेकिन मुझे मालूम तो हो कि इसकी वजह क्या है।”

“मैं कहती हूँ, मुझे मत छुइये।”

“तुम्हें मुझसे इतनी नफ़रत क्यों हो रही है?”

“आप नापाक हैं… बेहद ज़लील हैं।”

“देखो, तुम बहुत ज़्यादती कर रही हो।”

“आपने कम की है। कोई शरीफ़ आदमी आपकी तरह ऐसी ज़लील हरकत नहीं कर सकता था।”

“कौन सी?”

“आज सुबह क्या हुआ था?”

“आज सुबह?… बारिश हुई थी।”

“बारिश हुई थी… लेकिन उस बारिश में आपने किसको अपनी आग़ोश में दबाया हुआ था?”

“ओह!”

“बस इसका जवाब अब ओह ही होगा… मैंने पकड़ जो लिया आपको।”

“देखो मेरी जान…”

“मुझे अपनी जान-वान मत कहिये… आपको शर्म आनी चाहिए।”

“किस बात पर… किस गुनाह पर?”

“मैं कहती हूँ आदमी गुनाह करे… लेकिन ऐसी गन्दगी में न गिरे।”

“मैं किस गन्दगी में गिरा हूँ?”

“आज सुबह आपने उस… उस…”

“क्या?”

“उस भंगन को… जवान भंगन को जो मिठाईवाले के साथ भाग गयी थी।”

“लाहौल वला… तुम भी अजीब औरत हो… वह ग़रीब गर्भवती है, बारिश में झाड़ू देते हुए उसको ग़श आया और गिर पड़ी। मैंने उसको उठाया और उसके क्वार्टर में ले गया।”

“फिर क्या हुआ?”

“तुम्हें मालूम नहीं कि वह मर गयी?”

“ओह… बेचारी… मैं तो ठंडी बर्फ़ हो गयी हूँ।”

“मेरे क़रीब आ जाओ… मैं क़मीज़ पहन लूँ?”

“उसकी क्या ज़रूरत है? तुम्हारी क़मीज़ मैं हूँ।”

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