खूँटी पर कोट की तरह
एक अरसे से मैं टँगा हूँ
कहाँ चला गया
मुझे पहनकर सार्थक करने वाला?

धूल पर धूल
इस क़दर जमती जा रही है
कि अब मैं ख़ुद
अपना रंग भूल गया हूँ

लटकी हैं बाहें
और सिकुड़ी है छाती
उनसे जुड़ा एक ताप
एक सम्पूर्ण तन होने का अहसास
मेरी रगों में अब नहीं है

खुली खिड़की से देखता रहता हूँ मैं
बाहर एक पेड़
रंग बदलता
चिड़ियों से झनझनाता
और हवा में झूमता—
मैं भी हिलता हूँ
बस हिलता हूँ
दीवार से रगड़ खाते रहने के लिए

एक अरसा हुआ
हाँ, एक लम्बा अरसा
जब उसने चुपचाप दरवाज़ा बन्द किया
और बिना मेरी ओर देखे, कुछ बोले
बाहर भारी क़दम रखता चला गया—
‘अब तुम मुक्त हो
अकेले कमरे में मुक्त
किसी की शोभा या रक्षा
बनने से मुक्त
सर्दी, गर्मी, बरसात, बर्फ़,
झेलने से मुक्त
दूसरों के लिए की जाने वाली
हर यात्रा से मुक्त
अपनी जेब और अपनी बटन के
अपने कालर और अपनी आस्तीन के
आप मालिक
अब तुम मुक्त हो, आज़ाद—
पूरी तरह आज़ाद—अपने लिए’

खूँटी पर एक अरसे से टँगा
कमरे की ख़ामोशी का यह गीत
मैं हर लम्हा सुनता हूँ
और एक ऐसी क़ैद का अनुभव
करते-करते संज्ञाहीन होता जा रहा हूँ
जो सलीब अपनी कीलों से लिखती है
मुझे यह मुक्ति नहीं चाहिए
अपने लिए आज़ाद हो जाने से बेहतर है
अपनों के लिए ग़ुलाम बने रहना

मुझे एक सीना चाहिए
दो सुडौल बाँहें
जिनसे अपने सीने और बाँहों को जोड़कर
मैं सार्थक हो सकूँ
बाहर निकल सकूँ
अपनी और उसकी इच्छा को एक कर सकूँ
एक ही लड़ाई लड़ सकूँ
और पैबन्द और थिगलियों को अंगीकार करता
एक दिन जर्जर होकर
समाप्त हो सकूँ

उसकी हर चोट मेरी हो
उसका हर घाव पहले मैं झेलूँ
उसका हर संघर्ष मेरा हो
मैं उसके लिए होऊँ
इतना ही मेरा होना हो

खूँटी पर एक अरसे से टँगे-टँगे
मैं कोट से
अपना कफ़न बनता जा रहा हूँ

कहाँ हैं काली आँधियाँ?
सब कुछ तहस-नहस कर देने वाले
भूकम्प कहाँ हैं?
मैँ इस दीवार, इस खूँटी से
मुक्त होना चाहता हूँ
और तेज़ आँधियों में उड़ता हुआ
अपनी बाँहें उठाए
सीना चौड़ा किए
उसे खोजना चाहता हूँ—
जो चुपचाप दरवाज़ा बन्द कर
बिना मेरी ओर देखे और कुछ बोले
बाहर भारी क़दम रखता हुआ चला गया

मैं जानता हूँ
उसे कोई बुला रहा था
उसे कुछ चाहिए था
उसे एक बड़ी आँधी और भूकम्प
लाने वाली ताक़तों की खोज करनी थी
उसे यहाँ से जाना ही था
लेकिन कहाँ?
मैं उसके साथ जाना चाहता था
एक अरसे से खूँटी पर टँगे-टँगे
मैं भी
एक काली आँधी
एक बड़े भूकम्प की ज़रूरत
महसूस करने लगा हूँ
क्या वह भी
मेरी तरह
किसी खूँटी पर टँगे-टँगे थक गया था?
कोट था?

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सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना मूलतः कवि एवं साहित्यकार थे, पर जब उन्होंने दिनमान का कार्यभार संभाला तब समकालीन पत्रकारिता के समक्ष उपस्थित चुनौतियों को समझा और सामाजिक चेतना जगाने में अपना अनुकरणीय योगदान दिया। सर्वेश्वर मानते थे कि जिस देश के पास समृद्ध बाल साहित्य नहीं है, उसका भविष्य उज्ज्वल नहीं रह सकता।