अमृता प्रीतम की सम्पादकीय डायरी से

मैं नहीं जानती—दुनिया में पहली कौन-सी राजनीतिक पार्टी थी, और समय का क्या दबाव था कि उसे लोगों की आँखों से ओझल होना पड़ा था। इसी तरह यह भी नहीं जानती कि दुनिया की वह कौन-सी वस्तु थी जिसकी लोगों को बहुत ज़रूरत थी, और कौन-से पहले मुनाफ़ाख़ोर ने उसे तहख़ानों में डाल दिया था। पर यह यक़ीनी तौर पर जानती हूँ कि इतनी तकनीकी तरक़्क़ी के होते हुए भी, यह ऐसा समय है जब इंसानी रिश्ते ज़मीनदोज़ हो गए हैं।

मर्द और औरत के बड़े निजी रिश्ते से लेकर, इंसान और राज्य के रिश्ते तक में, एक ऐसा सम्बन्ध होता है, जो एक बहुत कोमल और सुन्दर चीज़ हो सकता था, पर वही आज अंग-अंग को छीलता हुआ किसी से पहचाना नहीं जाता। यूँ तो ब्याह आज भी जश्न के साथ मनाए जाते हैं, चुनाव आज भी उत्साहपूर्ण नारों के साथ लड़े जाते हैं, और वफ़ादारी की क़समें आज भी उसी तरह सजावटी रस्मों के साथ खायी जाती हैं, पर घरों की सेजें भी उसी तरह चुप और उदास हैं जैसे हकूमती कुर्सियाँ। सेजों और कुर्सियों ने जैसे अपनी-अपनी क़िस्मत के आगे हारकर सिर झुका दिया हो।

नहीं जानती—किसने किस पर वार किया है, कोई चीज़ हर जगह मर रही है, और हवा में एक गन्ध भरी हुई है—जिसमें हम सब साँस ले रहे हैं। और कोई चीज़ बहुत ज़ोर से हँस रही है—यह उद्देश्य की हँसी है, पर कैसा उद्देश्य! लगता है उसकी जून बदल गयी है, और उसी अभिशप्त उद्देश्य की हँसी बहुत भयानक हो गयी है। कोई ऊँची विद्या की प्राप्ति के लिए कमाइयाँ लुटाता है, पर किसी इल्म की ख़ातिर नहीं, किसी उस साधन की ख़ातिर जहाँ लुटायी हुई कमाई को गुणा दर गुणा करके लौटाया जा सके। कोई दोस्तियाँ गाँठता है, किसी के दुःख-सुख में शरीक होने के लिए नहीं या विचारों के किसी विनिमय के लिए नहीं, सिर्फ़ दूसरे के साधनों पर पैर रखकर आगे बढ़ जाने के लिए। ब्याह की सेज भी तन और मन की साझेदारी के लिए नहीं होती, और चाहे किसी भी उद्देश्य से हो, और चाहे सिर्फ़ इसलिए कि औरत का क़ानूनी-वेश्या बनना समाज की गठन में शामिल है।

ज़िन्दगी के बहुत क्षेत्र हैं जहाँ नित्य का इंसानी वास्ता ज़िन्दगी की ज़रूरतों का हिस्सा है—पर हर वास्ता शंकाओं से भरा हुआ, और हर चीज़ बिकाऊ—इंसाफ़ से लेकर इंसान तक।

तालियों की गूँज अभी कानों में ताज़ी होती है कि उद्देश्य का रूप बदल जाता है। कल की हार आज की जीत बनती है, तो बग़ावत जैसा लफ़्ज़ उसी पल बदला बन जाता है। किसी के पैरों के नीचे कुचले हुए लोग बल पाते हैं तो सिर्फ़ जगह की अदला-बदली के लिए, कुचलनेवाले पैरों की जगह पर खड़े होने के लिए। कल बग़ावत जिनकी आस्था होती थी, वही आज अगर जगह की बदली कर लें, तो सबसे पहले आनेवाले कल की बग़ावत का रास्ता बन्द करते हैं।

एक रोमानियम नज़्म सामने आकर खड़ी हो गयी है, जिसने एक भविष्यवाणी की थी कि वह दिन जल्दी आएगा जब हर चीज़ काग़ज़ की बनेगी—मनुष्य की चीख़ें काग़ज़ के साँपों की तरह रेंगेंगी और धरती कबाब खाकर उन लोगों से हाथ पोंछेगी जो पेपर नेपकिन बन चुके होंगे—और वह दिन आ गया है…

इस समय मैं ऐन्थनी क्विन की आत्मकथा पढ़ रही हूँ, और इस सब कुछ के विद्रोह में उसकी चीख़ सुनायी दे रही है—

“हम सब ग़द्दार है क्योंकि हम प्यार करना भूल गए हैं।”

भले ही यह सच है कि इंसानी क़द्रों और कीमतों की अन्तिम मौत नहीं है, पर इंसानी आचरण की ऐसी गिरावट है कि क़द्रें-कीमतें डरते हुए कही छिप गयी हैं। और इस मौत-जैसी ख़ामोशी में अब सिर्फ़ किसी ऐन्थनी क्विन की चीख़ सुनायी देती है…

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