अमृता: खुशवंत जी, सारी ज़िन्दगी आपका सम्बन्ध सरमायेदार श्रेणी से रहा है, पर उस श्रेणी का ग़ुरूर आपको छू नहीं सका। सारी ज़िन्दगी आपने एक मज़हब की नुमाइंदगी की है पर मज़हब की कट्टरता आपको छू नहीं सकी। और सियातसदानों की निकटता आप की निश्छलता को नहीं छू सकी। इस ‘अछूते खुशवंत’ का बल किस जगह पर है?

खुशवंत: अमीर ख़ानदान का हूँ, पर कई रिश्तेदार बड़ी ग़ुरबत में भी देखे। इस मुल्क में कौन है जो ग़ुरबत की भयानकता को आँखों से ओझल कर सके। माँ-बाप का दिया हुआ कभी तसल्ली नहीं बन सकता। यह ज़रूर हुआ कि भरे पूरे घर का होने के कारण, मुझे पैसे की न कभी कमी हुई और न कभी उसकी क़दर हई। हमारे क़रीबी दोस्तों में दो-तीन ख़ानदान ऐसे थे जो हम से कई गुना अमीर थे, मसलन सर श्री का, राम साराभाई का… पर यह कभी रश्क नहीं आया कि उनके पास हमसे बड़ी मोटरें हैं, या और बहुत कुछ है जो हमसे बहुत ज़्यादा है। कहानियाँ लिखने के लिए पहली ज़रूरी बात थी कि मेरा ताल्लुक़ बहुत साधारण और आम लोगों से हो, मैं उनकी ज़रूरतें जान सकूँ। साधारण मज़दूर, या निम्न मध्य श्रेणी के लोग मेरे ध्यान का मर्कज़ बने रहे।

मैं भीतर से बिलकुल नास्तिक हूँ। किसी मज़हब के लिए मेरे अंदर कोई लगाव नहीं है। पर सिक्ख घर में पैदा हुआ हूँ, इसलिए उसके साथ अपनत्व का अहसास स्वाभाविक तौर पर आया। मैंने रस्मिया तौर पर कभी पाठ नहीं किया, कभी गुरुद्वारे नहीं गया। पर दाढ़ी-केस रखे, क्योंकि चाहता था कि मैं सिक्ख क़ौम से जुड़ा रहूँ। सम्मान भी उन्हीं से चाहता था। अहसास होता था— “इन्हीं की कृपा से सजे हैं हम”… नहीं तो मेरे जैसे ग़रीब करोड़ों हैं। और मज़हबों से नफ़रत का सवाल ही पैदा नहीं होता। बचपन में मुसलमानों से कुछ नफ़रत सिखायी गई थी, वही बल्कि उलटे मुझे उनकी मुहब्बत के लिए कुछ असंतुलित कर गई…

रह गए सियासतदान, उनसे मुझे अमली नफ़रत है। जितने मिले हैं, सब झूठे मक्कार और ख़ुदग़रज़… दान्ते ने जैसे लिखा था—

“जहन्नुम की कई तहें होती हैं, उन सब तहों में मैंने सियासतदान देखे हैं। सातों दोज़ख़ उन्होंने ही भरे हुए हैं, हथियाए हुए हैं।”

जब मैंने यह सब देख लिया, फिर उनका असर कैसे हो सकता था..

बचपन से शेक्सपीयर की एक पंक्ति मेरे साथ लगी रही— “दिस एबव आल टु टाइन ओन सेल्फ़ बी ट्रू, ऐंड इट शैल फ़ालो ऐज दि नाइट द डे, ऐंड देन दाऊ रौल्ट नाट बी फ़ाल्स टु ऐनी मैन!”

इसलिए कह सकता हूँ कि इस अछूते रह गए खुशवंत का बल उसके अंदर के लेखक में है। मैंने हमेशा शीशे में अपनी सूरत देखनी चाही है, वह सूरत जिससे मुझे कभी शर्मिंदगी न हो…

अमृता: दौलत और शोहरत हमेशा आपको आगे बढ़कर मिली है, लेकिन किसी ऐसी घड़ी की बात बताइए जब किसी की मुहब्बत के लिए, या किसी और की प्राप्ति के लिए आपने जाना हो कि आरज़ू क्या होती है?

खुशवंत: अमृता, मैं नहीं मानता कि शोहरत मुझे आगे बढ़कर मिली है, दौलत ज़रूर मिली है। पर शोहरत के बारे में वह भी वक़्त था जब वकालत मुझसे नहीं हो सकी थी। डिप्लोमैटिक सर्विस से मैंने इस्तीफ़ा दे दिया था।

तब लोग मुझ पर हँसते थे कि यह लेखक बनना चाहता है, इम्तहान तो इससे पास नहीं होते, अब किताबें लिखेगा। ख़ासकर रिश्तेदारों के मज़ाक़ सुइयों की तरह चुभते रहे…

तुमने ख़ुद किताबें लिखी हैं, तुम जानती हो कि किताब लिखने में, छपने में और लोगों के पास पहुँचने तक, कितने बरस लगते हैं। मेरी किताब छप जाती, तब मैं लोगों से छिपता फिरा करता था कि वह कोई चुभने वाली बात न कर दें… फिर अब छोटी-मोटी शोहरत मिली है, तो उल्टा असर हुआ है, मैं अब पहचाने जाने से छिपता फिरता हूँ…

कई बार ऐसा हुआ है कि जब मन में किसी के लिए मुहब्बत आयी, तो मैं ख़ुद ही डरकर पीछे हो गया कि उस दूसरे का इंकार मुझे न जाने कहाँ से तोड़ जाएगा। यह मेरा ज़ख़्म खाने से परहेज़ था। तो यही बात आख़िर में मेरा स्वभाव बन गई…

आरज़ू मस्त हाथी की तरह थी, पर मैं ख़ुद ही उसका अंकुश बन गया। हमेशा बना रहा हूँ…”

अमृता: आपकी पत्रकारिता के मज़ाहिया अंदाज़ ने आपको लाखों पाठक दिए हैं, पर आपकी क़लम ख़ौफ़नाक हद तक बेख़ौफ़ भी है, क्या इस पहलू ने आपको कुछ ख़तरनाक दुश्मन नहीं दिए?

खुशवंत: बहुत दिए हैं अमृता। शायद तुम नहीं जानतीं कि इस वक़्त भी मुझ पर कितने मुक़दमे चले हुए हैं। हिन्दुस्तान का कोई सुवा नहीं है, जहाँ कचहरी में मेरी पेशी नहीं हुई।

श्रीनगर के कश्मीरी सिक्खों ने मेरे ख़िलाफ़ वारंट निकलवाए। आर. एस. एस. ने कोल्हापुर में भी, और दूसरे कई प्रान्तों में भी मुक़दमे किए। प्रेस काउन्सिल में जिन लोगों ने मेरे ख़िलाफ़ शिकायतें दर्ज करवायी हैं, उनमें गोपाल सिंह दर्दी भी हैं, तमिलनाडु का गवर्नर खुराना भी है, मुहम्मद यूनस भी… और और भी कितने ही हैं…

पार्लियामेंट में जब बिल पेश हुआ कि पार्लियामेंट के मेम्बरों की तनख़्वाहें बढ़ायी जाएँ, तो मैंने लेख लिखा था कि किसी भी साधारण आदमी से इन मेम्बरों के बारे में राय ली जाए तो वह कहेगा कि यह सब चोर हैं। वही चोर अगर ख़ुद अपनी तनख़्वाहें बढ़ा लें, तो यह कहाँ का न्याय है। इस लेख के ख़िलाफ़ एक सौ मेम्बरों ने ‘प्रिविलेज मोशन’ तैयार करके दस्तख़त किए थे। उसे हिदायतुल्ला ने डिसमिस किया था… नहीं तो…

इन मुश्किलों और मुसीबतों की आदत ही पड़ गई है अब तो। या तो दिल की कहूँ, या कुछ न कहूँ। सो, मैंने दिल की कहने का रास्ता चुना है…

अमृता: आपकी दोस्त-नवाज़ तबीयत को कभी वस्फ़ के लिए कोई नामुनासिब क़ीमत भी देनी पड़ी है?

खुशवंत: बहुत लोग दोस्ती का फ़ायदा उठाते हैं, यह क़ीमत सो देनी ही पड़ती है। वैसे असल बात यह है कि मेरा कोई दोस्त नहीं है। मेरे वक़्त को घुन की तरह लगे हुए लोग हैं…

अमृता: आपकी नज़र में दुनिया के वह कौन से अदीब या पत्रकार हैं, जिससे आपको कभी रश्क आया हो?

खुशवंत: हिन्दुतान में तो कोई नहीं। वैसे इज़्ज़त कइयों के लिए है—श्री मुलगांवकर के लिए, क्योंकि वह अंग्रेज़ी अच्छी लिखता है। अरुण शोरी और कुलदीप नय्यर के लिए एहतराम है, क्योंकि वह दिलेरी से लिखते हैं। पर अमरीका और बर्तानिया के पत्रकार कई हैं, जिनके लिए हसद जैसा अहसास आ जाता है…

अमृता: कम्बख़्त लेखक, ‘स्वयं’ के इतिहास का पात्र भी होता है, और उसका इतिहास भी। खुशवंत सिंह की जिस क़लम ने सिक्ख-इतिहास लिखा, वह क़लम कभी खुशवंत सिंह की इतिहासकार बनेगी?

खुशवंत: हाँ, अमृता, वह इतिहास भी लिखूँगा। वैसे तो कहानी-नाविल में भी कितना ही ‘स्वयं’ आ जाता है, पर ज़िन्दगीनामा भी लिखूँगा, बल्कि कह सकता हूँ कि कितना कुछ ज़ेहन में से उतरकर काग़ज़ों के हवाले हो चुका है… मैं खुशवंत सिंह का इतिहासकार भी बनूँगा… उस इतिहास में कई वह सियासी वाक़यात भी होंगे, जिनका चश्मदीद गवाह सिर्फ़ मैं था, या वक़्त था।

ज़िन्दगीनामा के कुछ हिस्से ऐसे हैं जिन्हें लिखते हुए मैं बहुत व्याकुल समय में से गुज़रा हूँ। वह तवारीख़ी हिस्से हैं। नेहरू, इंदिरा गांधी, संजय, मेनका, भुट्टो, मुजीबुर्रहमान, जियाउर्रहमान, जनरल टिक्का ख़ाँ, जियाउल हक़ और दूसरी कई बुलंद हस्तियों से मिलने के मुझे ख़ास तौर पर मौक़े मिले हैं, और मैंने उनके मिट्टी के पैर देखे हैं।

कई वह भी हैं जिन्होंने चालबाज़ियों से हैसियतें हासिल की हैं, चालबाज़ियों से, मक्कारियों से और हरामखोरियों से अहम पदवियों पर पहुँचे हैं। उन सबके बारे में मैं बेलाग होकर लिखूँगा। उनके बारे में मैंने बड़ी तफ़सील में नोट लिए हुए हैं।

अमृता: आपकी ज़िन्दगी की किसी दुखती रग पर हाथ रखने का मुझे या किसी को भी हक़ नहीं बनता। इसलिए सातवाँ सवाल आपके हाथ में सौंपती हूँ कि अपने हाथ से उस रग को छूकर उसकी बात करें।

खुशवंत: ज़िन्दगी-भर जज़्बाती लगाव को नज़र-अंदाज़ करते हुए कि वह मुझे कहीं से दुखा न जाए, मैंने अपनी नसों को एक सहम में सुखा लिया है और इस तरह मैं ज़िन्दगी के सबसे क़ीमती तजुर्बे से वंचित रहा हूँ—यह मुहब्बत में पूरी तरह अर्पित हो सकने और पूरी तरह स्वीकार कर सकने का अहसास था…

और अब जब ज़िन्दगी की साँझ की बेला है (‘रहिरास’ का या ‘मग़रिब की नमाज़’ का) ज़िन्दगी के इस शून्य को भरना मेरी दीवानगी बन गया है। क्या इस समय कोई वह मिलेगा जिससे मैं आवेश पूर्ण मुहब्बत कर सकूँ, और वह भी उसी शिद्दत से मेरी मुहब्बत को लौटा सके?

यह आरज़ू मेरी ज़िन्दगी के आख़िरी दिन तक रहेगी वह चाहे मुझे सोख ले, या मैं इसे अधूरी को अपने साथ कफ़न में लपेटकर ले जाऊँ…

यह भी पढ़ें: ‘अमृता के इमरोज़ से सात सवाल’

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अमृता प्रीतम
(31 अगस्त 1919 - 31 अक्टूबर 2005)पंजाब की सबसे लोकप्रिय लेखिका, कवयित्री व उपन्यासकारों में से एक।

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