हम नहीं खाते, हमें बाज़ार खाता है
आजकल अपना यही चीज़ों से नाता है

पेट काटा, हो गई ख़ासी बचत घर में
है कहाँ चेहरा, मुखौटा मुस्कुराता है

नाम इसका और उसके दस्तख़त हम पर
चेक बियरर है जिसे मिलते भुनाता है

है ख़रीददारी हमारी सब उधारी पर
बेचनेवाला हमें बिकना सिखाता है

सामने दिखता नहीं ठगिया हमें यों तो
हाँ, कोई भीतर ठहाका-सा लगाता है!

रामकुमार कृषक की कविता 'एक रजैया बीवी बच्चे'

Recommended Book:

Previous articleमैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर
Next articleउधार
रामकुमार कृषक
(जन्म: 1 अक्टूबर 1943)सुपरिचित हिन्दी कवि व ग़ज़लकार।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here