जाते वक़्त माँ

‘Jate Waqt Maa’, Hindi Kavita by Rashmi Saxena

जिस रोज़ गयी माँ
उम्र बच्चों से आकर लिपट गयी
मानों खींचकर बाँध दी गयी हो
रबड़ की भाँति बचपन पर

जैसे रात भर में बना देती थी
माँ पूरा एक स्वेटर
एक छोटी आटे की लोई से
बना देती थी समूची गोल-गोल
बड़ी एक रोटी कुछ ही सेकण्ड में

देह से लिपटकर रो नहीं रहे थे माँ की
गले लगकर सुन रहे थे
एक दूसरे की आत्मा की चटकन की आवाज़

विस्तार दे रहे थे अपने-अपने मस्तिष्क को
जिसमें सहेजे जा सकें स्मृतियों के
अधिक से अधिक पुष्प

अब नहीं गिरता पानी से भरा
कोई गिलास रसोईघर में
जिसमें फिसलकर गिरे बच्चे
पुचकारे जाने तक रोएँ

पेंसिलें बड़ी हो गयीं
वो अब दीवारों पर चित्रकारी नहीं करतीं

पीड़ा के दस्तवेज़ों पर
मौन ने हस्ताक्षर कर दिए
अब झगड़ा दोनों के बीच नहीं आता

जिम्मेदारियों के चौड़ीकरण में
कट गये खिलखिलाहटों के
छायादार वृक्ष

हठ की गीली ज़मीन पर
उग आयी उदासी की
कटीली नागफनी

चूर से चूर मिला लेते हैं
सेफ्टीपिन से, शर्ट के टूटे हुए
बटन की

पिता के गीले दुःख पर
हाथ फेरते बच्चे सोख लेते हैं
कुछ देर को अपनी हथेलियों में नमी
अपने आँसुओं से धो देते हैं
दुःख का चेहरा, वे अब
माँ बन गये हैं पिता की

जाते वक़्त माँ बच्चों को बड़ा
और पिता को माँ कर गयीं।

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