जिस नदी ने वर्षपर्यन्त
मुझे मीठे जल से सींचा
मैंने जाकर नहीं पूछा
उसके सूखने का कारण।

जिस वृक्ष ने वर्षपर्यन्त
मुझे मीठे फलों से आनन्दित किया
मैंने जाकर नहीं पूछा
उसके झड़ते पत्तों का कारण।

जिस बंजर मन में बिन पानी
उगे केक्टस के पौधे
मैंने जाकर नहीं पूछा
उनके पनपने का कारण।

काश कि
“पनपने से पूर्व ही
ग़लतफ़हमियों के
खर-पतवार को
उखाड़ फेंकती”
तो मरते हुए सम्बन्धों में
सम्वेदनाओं की कमी
को नमी मिल जाती।

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