‘Avsaad’, Hindi Kavita by Harshita Panchariya

अवसाद के लिए दुनिया में कितनी जगह थी
पर उसने चुनी मेरे भीतर की रिक्तता

मेरे भीतर के दृश्य को
देखने वाला कोई नहीं था
आख़िर नीले आसमान में स्याही के
निशान कौन देख सकता है?
आसमान ने भी नहीं गिनी गिरती हुई बूँदे
इसलिए मैंने भी
आँखों के लवण का भार नहीं तौला

हृदय के घाव बाहर से नहीं दिखते
दिखाती भी तो भला कैसे दिखाती
ये नख… हृदय तक पहुँचते भी तो नहीं
आदमी के भीतर देखने के लिए और कितना भीतर उतरना है
उसका कोई सटीक मापन भी तो नहीं

अवसाद का कोई ठौर ठिकाना नहीं
जहाँ जगह मिली
दीमक की तरह खोखला कर दिया
पर खोखलों में मात्र चिट्ठियाँ रखी जाती हैं
अपनी चिट्ठियाँ स्मृतियों में दर्ज करवाने के लिए
मैंने मेरी रिक्तता में भरे कुछ शब्द

अब मुझे तुमसे पूछना था
कि तुम क्या
भरोगे?

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