कवच

‘Kawach’, a story by Urmila Pawar

अनुवाद: कौशल्या बैसंत्री

सवेरे, अँधेरे में उठते ही इन्दिरा का मुँह चूड़ियों की तरह बजने लगा। रुक-रुककर वह गौन्या को मारने के लिए झपटती थी। वह बिफरकर गौन्या से पूछ रही थी कि वह उसे बाज़ार में आम बेचने जाने से क्यों रोक रहा है, “क्या बात हुई बोल।”

लेकिन गौन्या कोई दूसरा जवाब न देकर और अपनी रुलाई अन्दर-ही-अन्दर दबाकर एक ही बात दोहरा रहा था, “तू बाज़ार मत जा।”

इससे इन्दिरा ज़्यादा भड़क गई और चिल्लाते हुए उसे मारने के लिए उतावली होने लगी। इन्दिरा के चिल्लाने से गौन्या का खर्राटे भरकर सोता हुआ बाप जाग गया। वह दारूबाज़ था। दोनों पर बरस पड़ा और गालियाँ देने लगा, “साले, तेरे…माँ…की…भोंसड़ी के सोने भी नहीं देते हैं।”

“क्या हुआ, गौन्या क्या कहता है?” आस-पास की एकाध औरत ताक-झाँक करक पूछ रही थी।

इन्दिरा गौन्या को गाली दे रही थी, “मुए का मुँह जले, बुख़ार चढ़ा है इस मरे को।”

थोड़ी देर शांति से गुज़ारी। इसके बाद फिर से इन्दिरा का पारा ऊपर चढ़ा और उसने भड़ककर गौन्या से पूछा, “मुए तू कह रहा बाज़ार में आम बेचने मत जा। बता तुम लोग क्या खाओगे, राख? देखा अपने बाप को कैसा सोया पड़ा है। आग लगे तुम लोगों के मुँह को।” इन्दिरा बड़बड़ाती रही।

“इसकी आवाज़ घर में ही चलती है। बाज़ार में ग्राहकों के सामने एकदम बन्द हो जाती है।” गौन्या क्षोभ में अपने आपसे बड़बड़ा रहा था।

रोटी के टुकड़े करते-करते इन्दिरा गौन्या की तरफ आँखें निकालकर देख रही थी और गौन्या भी मार खाए कनगोजर की तरह आँखें फाड़े देख रहा था। रो-रोकर उसकी आँखें लाल हो गई थीं। उसका बदन गर्म हो रहा था। नाक फूल रही थी। उसकी फुसफुसाहट चालू थी। गौन्या के साथ बैठकर प्यार से उसकी पीठ थपथपाने का समय इन्दिरा के पास नहीं था। दिन निकलने के पहले उसे बाज़ार में आम लेकर जाना था। रात में ही उसने आम की पेटी खोलकर उसमें से अच्छे-अच्छे आम छाँटकर एक बड़ी टोकरी में एक ओर रखकर सोचा कि इस आम के बदले में वह मछलियाँ ख़रीदेगी। उसने सोचा था कि गौन्या के सिर पर टोकरी लदवाकर वह बाज़ार जाएगी, पर वह बाज़ार जाने के लिए मना कर रहा था। उसका झंझट जारी था। मार खाकर भी उसके बाज न आने से इन्दिरा का पारा चढ़ रहा था।

“गौन्या, अब अपना फुसफुसाना बन्द कर और नदी से एक घड़ा पानी ला। उठ, जल्दी कर। दिन निकल रहा है।”

इतने में “क्या हुआ…” कहते हुए पड़ोस की साबू माय अन्दर घुस आयी। पूछने लगी, “क्यों झगड़ रहे हो?”

“हूँ, यह ख़ुद झगड़ालू औरत है अव्वल नम्बर की। इसे झगड़ा करने के सिवा कोई काम नहीं। गाँव के ही आदमी नहीं, बाज़ार में भी लोग इससे डरते हैं। मछली बेचनेवाली दबंग औरतें भी इससे सहमी रहती हैं। अब यह यहाँ आग में घी डालने आयी है।” गौन्या अपनी आँखें साबू माय की तरफ़ करके बड़बड़ाया।

“क्यों रे बच्चे, क्या हुआ?” कहते हुए साबू माय गौन्या के सामने बैठकर उसकी पीठ पर प्यार से हाथ फेरते हुए मीठे स्वर में पूछने लगी कि वह क्यों रो रहा है। साबू माय के अनपेक्षित प्यार से गौन्या सकपकाया और उसका मन भर आया। वह अपना रोना अन्दर-ही-अन्दर दबाकर मायूसी भरी आँखों से साबू माय की ओर देखने लगा। बोले या न बोले, इस विचार से उसने अपना मुँह बिचकाया, परन्तु ढिबरी के मन्द उजाले में गौन्या के चेहरे का द्वंद्व उन दोनों को नहीं दिख सका।

“गौन्या, बेटे तू सयाना लड़का है न, अब चल, जल्दी उठ, हमें बाज़ार जाने के लिए देर हो रही है।”

साबू माय प्यार से बोली, परन्तु गौन्या अचेत-सा बैठा ही रहा।

“यह ऐसे नहीं मानेगा, उसे तो यह चाहिए।” कहकर इन्दिरा ने चूल्हे में से जलती लकड़ी निकाली और गौन्या के पास जाकर बोली, “अब उठता है या नहीं कि दूँ तेरे मुँह पर एक… ”

गौन्या डरकर पीछे हटा। साबू माय ने जल्दी से इन्दिरा के हाथ से लकड़ी छीनी और गौन्या को अपनी पीठ के पीछे करके बोली, “दुष्ट, क्या करती है! इकलौता बेटा है। स्कूल में पढ़ता है और तू उसे दाग़ रही है।”

“मुआ आजकल जा ही कहाँ रहा है स्कूल। गाँव भर में मटरगश्ती करता है।” क्रोधित नज़र से उसकी ओर देखकर इन्दिरा ने कहा।

गौन्या साबू माय के पीछे तनकर फन उठाए नाग की तरह एकदम सीधा खड़ा हो गया। परसों स्कूल में घटी घटना के बारे में शब्द उसके होंठों पर आने लगे। वह अपना मुँह खोलने लगा, लेकिन जो मुँह से निकले वे दूसरे ही शब्द थे, “तुम मुझे किताबें ख़रीदकर नहीं देती, मैं स्कूल नहीं जाऊँगा।”

“अच्छा-अच्छा, आज ख़रीद दूँगी। अब जा और जल्दी से नदी से एक घड़ा पानी भर ला, जा।”

गौन्या को आगे बोलने को मौक़ा न देकर इन्दिरा ने हुक्म झाड़ा। उसने लड़के के हाथ में घड़ा देकर उसे घर से बाहर धकेल दिया। ग़ुस्से से फुसफुसाते हुए गौन्या बाहर निकला। उसे ग़ुस्सा अपने आप पर आ रहा था, “मैं आज दो-तीन दिन से अपनी माँ को एक बात बताना चाह रहा हूँ, परन्तु मैं क्यों नहीं कह पा रहा? ऐसी कौन-सी बात है उन शब्दों में जो मैं, उनका उच्चारण करने में शर्म महसूस करता हूँ। उस दिन की घटना से तो तुझे स्कूल जाने में भी शर्म लगने लगी है।”

चौथी पास करके गौन्या पाँचवी में गया। इन्दिरा ख़ुश हुई और सोचा कि गौन्या ख़ूब पढ़-लिखकर अच्छी नौकरी करेगा, तब उसके दुःख ख़त्म हो जाएँगे। इसी आशा में इन्दिरा ने उसे अच्छे स्कूल में पढ़ने भेजा। गौन्या भी ख़ुशी से नियमित स्कूल के बाहर खेल रहे थे। खेलते हुए एक का ध्यान पेड़ के नीचे खाना खा रही शिक्षिका और शिक्षक की तरफ़ गया। गौन्या ललचाई नज़रों से उनके टिफ़िन की रोटियों और सब्ज़ी को देखने लगा। इतने में शिक्षक और शिक्षिका में कुछ अनबन हो गई और वे दोनों हाथों से इशारे करके ज़ोर-ज़ोर से लड़ने लगे। बच्चों का झुण्ड खड़ा चुपचाप यह सब देख रहा था। गौन्या भी यह झगड़ा देखते हुए सबके आगे खड़ा था। शिक्षिका बड़े रौब से शिक्षक से पूछ रही थी, “आपको ऐसे गन्दे शब्द का उच्चारण करते वक़्त शर्म नहीं आयी?”

“परन्तु मैंने ऐसा क्या कहा। जो सच है, वही तो कह रहा हूँ। आप जो आम लायीं, वे यहाँ के आमों से बड़े हैं। इसलिए मैंने कहा कि आपके आम बड़े हैं।”

“अच्छा अब ज़्यादा बोलने की ज़रूरत नहीं है।” शिक्षिका ग़ुस्से से बोली।

“पर बहन जी!” कहते हुए शिक्षक ढिठाई से हँसने लगा, जिससे शिक्षिका और भी भड़क गई।

“शर्म नहीं आती आपको, ऊपर से दाँत निकालते हैं।” चिल्लायी और शिक्षक के होंठों पर आयी हँसी काफ़ूर हो गई। उसका चेहरा उतर गया। उसने कुछ कहने के लिए होंठ फड़फड़ाए तो शिक्षिका ने फ़ौरन कहा, “आप बार-बार इस गाँव का नाम ही क्यों बोलते हैं?”

शिक्षक ने कहा, “क्यों नहीं बोलना चाहिए? इस गाँव का नाम चोली नहीं है क्या? चोली गाँव। फिर चोली के आम नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे?”

“देखिए अभी भी आप बेशर्मी दिखा रहे हैं। इस गाँव का नाम चोली है, यह एक अनाड़ी बच्चे को भी मालूम है। पर बार-बार यहाँ इसका उल्लेख करना ज़रूरी है क्या?” अपनी उँगली ऊपर करके शिक्षिका ने शिक्षक की नाक के सामने हिलाते हुए डाँटा।

“बहन जी क़सम खाकर कहता हूँ कि मेरा… मैंने बुरे मतलब से नहीं कहा।” शिक्षक गिड़गिड़ाने-सा लगा।

फिर भी शिक्षिका नाक फुलाकर कहती रही, “आपकी मंशा साफ़ नहीं थी।”

“बहन जी मैं क्या कह रहा हूँ, यह तो सुन लीजिए।” यह कहते हुए एक दूसरा शिक्षक पहले शिक्षक की मदद के लिए आया।

“मज़े की बात यह है कि…।”

“इसमें मज़े की कौन-सी बात है? तुम आदमियों को ऐसी बातों में हमेशा मज़ा आता है।” शिक्षिका ने दूसरे शिक्षक को भी डाँटा।

“बहन जी, यहाँ पर सभी लोग ऐसा ही कहते हैं।” पहलेवाले शिक्षक ने कहा, “यहाँ की औरतें शहर के बाज़ार में आम बेचने जाती हैं तो सभी लोग उनसे पूछते हैं कि चोली के आम क्या भाव दिए। यह गौन्या भी बताएगा, आपको। क्या रे गौन्या, तुम्हारी माँ बाज़ार में आम बेचती है, तब उसे भी लोग ऐसा ही पूछते हैं न?” गौन्या को आगे करते हुए शिक्षक ने कहा।

“गौन्या से पूछने की क्या ज़रूरत है। तुम आदमी लोग एकदम हलकट हो।”

“हे… बहन जी मुँह सम्भालकर बात कीजिए आप, हलकट किसको कह रही हैं।” अपमानित होकर शिक्षक चिल्लाया।

“आपको… आपको ही कह रही हूँ मैं।” शिक्षिका ने आँखे तरेरी और आधा बचा खाना वैसा ही छोड़कर अपना टिफ़िन बॉक्स लेकर तेज़ी से कक्षा की ओर चली गई।

ताव में आकर शिक्षक भी चले गए।

हो, हो, ही, ही, करके शोर मचाते सातवीं कक्षा के तीन-चार लड़के चले गए और कुछ यूँ ही गौन्या को देखकर ठिठक गये। कुछ कानाफूसी कर रहे थे। कुछ बच्चे गौन्या की तरफ़ आँखें मिचकाकर हँसने लगे। इतने में स्कूल की घण्टी बजी और बाक़ी बच्चे कक्षा की ओर भागे। पर गौन्या के पाँव नहीं उठे।

गौन्या यह सब सुनकर हक्का-बक्का हो गया था। आम बड़े… आम… तुम्हारे आम, चोली के आम, उसके हमेशा से परिचित शब्द। लेकिन अब वही शब्द गोफन से छूटे पत्थर की तरह गरगराते हुए उसके सिर से टकरा रहे थे और वह चकराकर सिर्फ़ अवाक खड़ा था। गौन्या अकबकाया हुआ वहीं पेड़ के नीचे बैठा रहा। उसके सिर में दर्द होने लगा। शिक्षकों के झगड़े ओर उनके शब्द सुनकर ही उसके दिल में दर्द-सा उठा कि ऐसा क्यों हो रहा है। उस शब्द में ऐसी कौन-सी बात है, जिससे शिक्षकों में झगड़ा हुआ। शिक्षिका को उन शब्दों से चिढ़ हुई और झगड़े की परिस्थिति बनी। तब इन शब्दों का मतलब ज़रूर बुरा होगा। बहन जी अच्छी पढ़ी-लिखी महिला हैं, अच्छे परिवार से आती हैं, हमें अच्छी बातें बताती हैं, इसलिए उन्होंने इन शब्दों का बुरा अर्थ समझा होगा और लड़ पड़ी। बहन जी ने शिक्षकों से झगड़ा किया तो अच्छा ही लगा। बहन जी बड़ी महान हैं। वहाँ वे और कहाँ मेरी माँ और गाँववाली औरतें।

गौन्या की नज़र के सामने बाज़ार घूमने लगा। माँ के आस-पास ग्राहकों की भीड़ और खींचातानी… उनकी तरह-तरह की आवाज़ें। लम्बी आवाज़, “ऐ आमवाली, तुम्हारे आम कैसे? दिखाओ निकालकर, कड़े हैं या नरम, पिलपिले? मामी, चोली के आम हैं क्या, ऐ… दिखाओ ज़रा अपना आम!”

बाज़ार की इस याद से गौन्या को चक्कर आने लगा। एक बार वह मेले में गया था और झूले में बैठा था। जैसे-जैसे झूला वेग से ऊपर जाता था, उसके पेट में डर का गोला उठता था। आज उसकी हालत वैसी ही हो रही थी। वे शब्द, वे ग्राहक, वे बाज़ार सब उसके मन में समा गया।

“मुए, यहाँ क्यों मर रहा है?” इस धिक्कार से गौन्या होश में आया। इन्दिरा सींग मारनेवाली भैंस की तरह आधे रास्ते में खड़ी हो गई और झटके से उसके हाथ से घड़ा खींचकर पीठ पर एक मुक्का जड़ दिया। “चल जल्दी से पाँव… उठा।” वह गौन्या को मस्त जानवर की तरह मारते हुए धकेलकर घर के पास लायी।

सब आम बेचनेवाली गाँव की औरतें इन्दिरा के इंतज़ार में खड़ी थीं। गौन्या मजबूर हो गया। मन का क्रोध दबाकर उसने जैसे-तैसे रोटी निगली और पिलपिले आमों की टोकरी उसके सिर पर रखते हुए इन्दिरा चिल्लायी, “हैं…चल।”

“आम थैले में दे।” गौन्या मुँह फुलाकर बोला। इन्दिरा बड़बड़ाते हुए कहीं से ढूँढकर थैला लायी, टोकरी में भरे आम उसमें डाले और उसके सिर पर पटक गाँव वाली औरतों के पास पहुँचने के लिए दौड़ पड़ी। गौन्या ने सिर पर से थैला उतारकर अपने कंधों पर रखा और चल पड़ा।

टेढ़े-मेढ़े रास्तों, बस्तियों, पगडण्डियों को पीछे छोड़ते हुए सब लोग सीता के बाग़ के पास पहुँचे। सीता के खुले बाग़ से उनका पुराना परिचय था। परन्तु गौन्या की अनुभूति आज कुछ अलग थी। क्षितिज फैला हुआ, यह खुला मैदान और उसे आलिंगन में लेने वाला आकाश बहुत विशाल दिख रहा था। पहली बार गौन्या को इसकी भव्यता का आभास हुआ, जिसके आगे सब कुछ बौना लग रहा था, किसी कीड़े या चींटी के समान। गौन्या को भी लगा कि वह भी बहुत छोटा है।

क्षितिज की तरफ़ जाती सीधी सड़क पर आमवाली औरतें जल्दी-जल्दी रास्ता तय कर रही थीं, चलते-चलते वे अपना सुख-दुःख एक दूसरे को बता रही थीं। कोई रोकर तो कोई हँसकर। गौन्या तटस्थ भाव से उनकी ओर देखते हुए पीछे-पीछे आ रहा था। उन गाँववाली औरतों को देखने में उसकी नज़र आज कुछ अजीब थी। उनकी साड़ियों के फटे पल्ले के नीचे से चलते वक़्त हिलने वाले उनके कूल्हे, फटी चोली में से दिखनेवाली उनकी पीठ और पीछे की ओर से भी नज़र आनेवाले नीचे लटकते उनके स्तन साफ़ नज़र आ रहे थे।

चलते-चलते गौन्या का पाँव किसी काँटेदार चीज़ पर पड़ा और छोटे-छोटे सुई के समान काँटे उसके पाँव में घुस गए। सिर से आम का थैला एक ओर गिर पड़ा। “ओ माँ” कहकर वह ज़ोर से चिल्लाया और नीचे बैठ गया।

इन्दिरा उसकी आवाज़ सुनकर एकदम रुक गई। सिर का बोझा सम्भालते हुए गरदन घुमाकर देखा और चिल्लायी, “आँखें फूट गई है क्या तेरी, ठीक से देखकर क्यों नहीं चलता। अब उठा।” पर गौन्या नहीं उठा। वह मजबूरन पीछे लौटी और बोझा सम्भालते हुए तलवों के बल बैठकर चिमटी से धीरे-धीरे एक-एक काँटा निकालने लगी। वह बड़बड़ भी कर रही थी, “अरे सीता के मैदान का यह सीधा-सीधा रास्ता भी तुझे नहीं दिखता क्या? इतनी देर से जाने से बाज़ार बन्द हो जाएगा। फिर हमारे आम कैसे बिकेंगे।”

“माँ आज सिर्फ़ आम बोलना और अपनी साड़ी का पल्ला ठीक से रखना।” गौन्या ज़ोर से बोला। पर इन्दिरा का ध्यान उसकी बातों की ओर न था, वह आगे जाने वाली अपने गाँव की औरतों की ओर देख रही थी। उसने आम का थैला गौन्या को दिया। वह अपनी टोकरी उठाकर चलने लगी। गौन्या क़दम बढ़ाते हुए सम्भलकर चलने लगा। सीता के मैदान में छोटे-छोटे काँटों के पेड़ जगह-जगह लगे थे और उनके छोटे-छोटे काँटे निकलकर ऊपर आए हुए थे। वह मैदान एकदम सुनसान और डरावना लग रहा था। गौन्या को यकायक डर लगने लगा और रोंगटे खड़े हो गए। वह जल्दी-जल्दी इन्दिरा के पीछे दौड़ने लगा।

बरसात के दिनों में इस मैदान की छटा कुछ और ही दिखती थी। पूरा मैदान कितने छोटे-छोटे पीले सोनवली के फूलों से भर जाता। फूल ज़मीन को आच्छादित करके हँसते रहते। लगता कि जैसे दूर क्षितिज तक किसी ने सुनहरे पानी की बौछार कर दी हो। इसी सुनहरे दृश्य को देखकर किसी पूर्वज को सीता की सुनहरे मृग की खाल से बनी चोली की याद हो आयी थी और उसने बंजर भूमि को ‘सीता का बाग़’ और उसके पास बसे गाँव को ‘सीता की चोली’ नाम दे दिया था। कालान्तर में सही ‘सीता की चोली’ नाम का गाँव सिर्फ़ चोली नाम से जाना जाने लगा। गौन्या को यह कहानी उसी शिक्षिका से मालूम हुई थी। कहानी कहते वक़्त बहन जी का चेहरा प्रसन्नता से भर जाता था, लेकिन उस दिन शिक्षकों से लड़ते वक़्त तो वह…।

सीता का मैदान, नाले और टीले पार करते हुए चोली गाँव की औरतें शहर के पास पहुँचीं। बाज़ार गाँव के और आस-पास के लोग भी अपना सामान, घास के गट्ठर, चकला-बेलन, सिलबट्टा, आम-करवंद, कटहल और अन्य चीज़ें सामने रखकर बेचने बैठे थे।

शहर की हवा लगते ही गौन्या मस्त और ख़ुश हो जाता था, लेकिन आज वह बेचैन लग रहा था। उसका दिल धड़क रहा था लेकिन वह किसी तरह अपने मन पर क़ाबू किए हुए था। धीरे-धीरे उसके दिमाग़ में उन शब्दों का अर्थ और ग्राहकों की बदतमीज़ हरकतों का मतलब साफ़ हो रहा था। उसने मन-ही-मन में सोचा कि अब वह अपने गाँव की औरतों और अपनी माँ को हिदायत देगा कि वे अपने गाँव का नाम न बताएँ। ग्राहक न मानें और गाँव का नाम पूछे तो ग़ुस्सा करें और नाम न बताएँ, सिर्फ़ आम कहें।

“रुको, पीछे हटो।” कहते दो पुलिसवाले आगे आए। उन्होंने रास्ते पर से सब लोगों को हटाया। मोटरें और साइकिलें भी एक ओर थीं। मोटर से एक-दो साहब उतरकर रास्ते के किनारे गए। वहाँ एक लकड़ी की तख़्ती पर हार डाला। लोगों ने तालियाँ बजायीं, पुलिसवाले कह रहे थे कि गाँव का नामान्तरण हो गया। पहले किसी जगह पर लगी एक छोटी-सी तख़्ती पर ‘कुईगाँव ठाण’ लिखा रहता था। गौन्या इस नाम को देखकर हँसता था कि अब यहीं से शहर की ‘कोल्हे कुई’ (सियार का हुक्की हाव) शुरू होगी। अब सामने तख़्ती पर ‘इन्दिरा नगर’ नाम चमक रहा था। गौन्या सोचने लगा कि उसके गाँव का नाम भी बदला जाना चाहिए।

चोली गाँव। छिः, कैसा है यह नाम। लेकिन अपने गाँव का नाम क्या रखा जाए। वह इन्दिरा नगर यानी अपनी माँ इन्दिरा के नाम पर नहीं, माँ के नाम नहीं। साबू माय के नाम पर ‘सावित्री नगर’ रखा जाए। वह अच्छी दबंग है और लोग उससे डरते भी हैं या अपनी शिक्षिका के नाम पर?

“ऐ मामी, आम कैसे… दिखाओ तो अपने आम।” इस आवाज़ से गौन्या की तन्द्रा भंग हो गई। उसने देखा एक आदमी माँ को छेड़ने की कोशिश कर रहा है। इन्दिरा जल्दी-जल्दी चल रही थी और वह आदमी उनके साथ-साथ चल रहा था। कन्धे का थैला सम्भालते हुए गौन्या तीर के समान उन दोनों के बीच पहुँच गया और माँ को ढकेलते हुए बोला, “नहीं हमें आम नहीं बेचने।”

“क्या आम बेचने नहीं हैं तो क्या दिखाने के लिए हैं? फिर दिखाओं न मामी।” ऐसा कहकर वह बेशर्म आदमी माँ के पीछे-पीछे चलता रहा और गौन्या बीच में पड़कर माँ को एक ओर ढकेलता रहा। दो-तीन लोग ऐसे ही बदतमीज़ी करके चले गए। गौन्या उनका प्रतिकार करता रहा।

“अरे, ऐसे क्यों मेरे पाँव में टाँग अड़ा है रे, उधर हट।” इन्दिरा ने गौन्या को एक ओर ढकेला। गौन्या थैले के साथ लड़खड़ाया। इन्दिरा पर ग़ुस्सा होकर उसका मन हुआ, थैले को पटक दे। माथे पर बल चढ़ाकर ग़ुस्से से भुन-भुन करते हुए वह दूर चला गया।

भीड़ भरा बाज़ार आ गया। रास्ते के दोनों ओर गाँव के लोग अपना-अपना सामान लेकर बैठे थे और उनके आस-पास लोगों की भीड़ जमा थी। आमवालियों का जत्था आते ही ग्राहकों की भीड़ उनके आस-पास जमा हो गई। टोकरियाँ उतारने के पहले ही दस-बारह हाथ टोकरियों में घुसे। इधर-उधर से ग्राहक जल्दी-जल्दी आम उठाने लगे और अपने थैले में भरने लगे थे। किसने कितने आम लिए, इसका पता नहीं लगता था। इन्दिरा एक का थैला खोलकर देखने का प्रयत्न करती तो दूसरा ग्राहक आम अपने थैले में भरने लगता था, कोई जान-बूझकर हिसाब में गड़बड़ कर रहा था। इन्दिरा सबके थैलों को पकड़कर खींचातानी करते हुए गिड़गिड़ा रही थी।

दड़बे में से अपने चूज़ों के साथ बाहर निकली मुर्ग़ी की तरह ग्राहक इन्दिरा को परेशान कर रहे थे। वह गौन्या को मदद के लिए बुला रही थी, “गौन्या, आना रे, इधर आना देख, पैसे गिनकर रख।” पर गौन्या अनसुनी करते हुए दूसरी ओर देख रहा था।

इन्दिरा की दूसरी तरफ़ साबू माय चार-पाँच हाथ की दूरी पर बैठी थी। चमचमाते काँच के समान के पीछे बैठे रौबदार दुकानदार की तरह वह ख़ुद अपने हाथ से ग्राहक को आम गिनकर दे रही थी। ग्राहक भी ठीक तरह से आम लेकर पैसे देते थे। न खींचातानी करते, न पैसे देने में गड़बड़ करते। अगर किसी ने कुछ बदतमीज़ी करने की कोशिश की तो साबू माय उसे डाँटती-फटकारती, “ऐ रुक, हाथ मत लगा, मैं दूँगी आम गिनकर!” या “कितने पैसे दिए? अच्छा हिसाब करके दे।” बड़े रोब से बोलती थी। उसका काम भी सही ढंग से चल रहा था।

साबू माय के अक्खड़ और कड़े स्वभाव के आगे गौन्या को अपनी माँ एकदम ढीली-ढाली लगती थी। इसीलिए तो ग्राहक उसके साथ बुरा बर्ताव करते थे। गौन्या को माँ से चिढ़ होने लगी, उसे शर्म भी महसूस हो रही थी। उसे लगा कि उसकी माँ इन्दिरा न होकर साबू माय होनी चाहिए थी। वह साबू माय के पास सरक जाता। मन-ही-मन सोचने लगा कि वह अब से अपनी माँ का कहना ज़रा भी नहीं मानेगा और माँ को ज़्यादा तकलीफ़ देगा। वह ऐसा बर्ताव करेगा कि उसकी माँ तंग हो जाएगी।

दोपहर की कड़ी धूप बदन को चुभ रही थी। पेट में भूख से चूहे कूदने लगे थे। जब आम ख़त्म होंगे और तब पेट में रोटी जाएगी। गौन्या सोचने लगा। बीच में वह कुछ दागी आम निकाल-निकालकर खाता रहा।

ग्राहकों की भीड़-भाड़ कम होने पर थोड़ी स्थिरता आयी। अच्छे आम बिक गए थे। चोली गाँव की औरतें धूप से बेहाल हो चुकी थीं और अपना पसीना पोंछकर अपने गेंडुली पर सिर टिकाकर लेट गई थीं। एकाध ग्राहक आ जाता तो हड़बड़ मच जाती थी।

इतने में “ए मामी, आम कैसे दिए।” पूछते हुए चार-पाँच मुसलमान मछुआरिनों का दल इन्दिरा के आस-पास जमा हो गया। सीताफल की तरह गोलमटोल इन औरतों के पास आते ही उनके बदन से मछली की गन्ध नाक में घुसी।

मछलियाँ बेचकर वे घर जाने को निकली थीं। उन्होंने ख़ूब जेवर पहन रखे थे, दो-चार पैसों के लिए वे बहुत घिस-घिसकर रही थीं। हाथों से आम उठाकर उन्हें दबा-दबाकर देखते हुए अपने थैलों में भर रही थीं।

“अरी रुको, कितने आम लिए?” ऐसा कहते हुए इन्दिरा उन्हें रोक रही थी।

“रुक जा, हाथ हटा, हमें चुनकर आम लेने दे मामी, कितने छोटे हैं तुम्हारे आम?”

“कहाँ के हैं ये आम? चोली के? हाँ इसलिए ही छोटे हैं… चौदह-पन्द्रह बरस की लड़की के…।” ही-ही करके वे औरतें हँसने लगीं।

“अरी ठीक से आम लो, ठगने की कोशिश मत करो।” फटी साड़ी का पल्ला ठीक करके अपनी छाती ढँकने की कोशिश करते हुए इन्दिरा ने कहा। इन्दिरा यह कहते हुए बेबस और लाचार लग रही थी, मानों छोटे आम होना भी उसका दोष है।

गौन्या यह सब देखकर आगबबूला हो रहा था। मछुआरिनों के गन्दे शब्द सुनकर उसने सोचा, “छी, औरतें भी ऐसा कहती हैं और माँ भी ये बातें बरदाश्त करती है। माँ को उन्हें डाँटना चाहिए था।”

“अरी पन्द्रह रुपये कैसे हुए?” इन्दिरा ने कहा, “बीस रुपये और चार रुपये हुए हैं।” हिसाब बता रही थी इन्दिरा उनको।

“आँ, इतने रुपये कैसे हुए? इसने दो दर्ज़न, उसने दो दर्ज़न, मैंने तीन दर्ज़न। ख़ैरनुस्सा, तुमने कितने लिए? एक दर्ज़न, हाँ फिर कितने हुए, पाँच दर्ज़न हुए कि नहीं। फिर पन्द्रह रुपये बनते हैं।” मछुआरिने हिसाब में गड़बड़ी कर रही थीं।

“पाँच दर्ज़न कैसे हुए! आठ दर्ज़न हुए दिखाओ थैले।” कहते हुए इन्दिरा उनके थैले खींचने लगी थी।

वे औरतें बार-बार वहीं बातें दोहराकर बड़बड़ा रही थीं। गौन्या के हृदय पर उनके गन्दे शब्द घाव कर रहे थे। अब उससे और सहन नहीं हुआ। वह झटके से उठा और बिल्ली के बच्चे की तरह ग़ुर्राता हुआ उनके आगे खड़ा हो गया। उनके थैलों को खींचकर वह चिल्लाया, “रखो, रखो आम, हमें नहीं बेचने रखो….।”

“या अल्ला, रे ज़ुबैदा देखो तो? यह उँगली के इतना लड़का हमें डाँट रहा है।”

“क्यों रे, यहाँ आम बेचने आया है या अंडे सेने, आँ! चल हट इधर।” ऐसा कहकर उसको एक ओर ढकेल दिया और पन्द्रह रुपये इन्दिरा के ऊपर फेंककर वे वहाँ से रफ़ूचक्कर हो गईं।

“राँडों का मुँह जले, राँडों को मेरे आम नहीं पचेंगे, इनको टट्टियाँ लगेंगी और उसमें से आम गिरेंगे।” इन्दिरा ग़ुस्से से अपनी अंगुलियाँ मोड़ रही थी, गालियाँ दे रही थी।

सभी आम बेचनेवाली औरतों का ऐसा ही हाल था। वे असहाय थीं और बिक्री का युद्ध अकेले ही लड़ रही थीं। मदद की अपेक्षा से गौन्या साबू माय की तरफ़ देख रहा था, पर वह अलिप्त भाव से अकेली बैठी थी। उसके सारे आम बिक चुके थे। एक आदमी उसके सामने बैठा था। अधेड़ उम्र का, मोटा, और बड़ी-बड़ी मूछोंवाला। उसने अच्छे-अच्छे कपड़े पहन रखे थे। मुँह में पान चबाते-चबाते वह साबू माय के साथ धीरे-धीरे बातें कर रहा था। वे दोनों हँस रहे थे। वह आदमी साबू माय के साथ क्या बातें कर रहा होगा? शायद चोली, आम वगैरह ऐसा ही कुछ…। गौन्या को कैसा लगा नामान्तर… सावित्री गाँव उसके मन की तख़्ती से उड़ गया।

“क्या मामी, आम कैसे तुम्हारे.. तेरे… आँ? दिखाओ, देखें।” हकलाते हुए ये शब्द गौन्या के कानों में पड़े। दारू की तीखी गंध नाक में घुसते ही गौन्या सीधा खड़ा हो गया और उस आदमी की ओर देखने लगा। दो शराबी लड़खड़ाते हुए इन्दिरा के आगे खड़े हो गए। दोनों की आँखें लाल थी। उनके कपड़े अस्त-व्यस्त थे। उनकी पैंट नीचे खिसक गई थी। और एक पैंट में बटन ही नहीं थे। दोनों नीचे बैठकर, विचित्र मुँह बनाकर कुछ बड़बड़ा रहे थे। इन्दिरा की टोकरी में हाथ डालकर कह रहे थे, “क्यों री मामी, बोलती क्यों नहीं! आँ बता ये आम कहाँ के हं-हं,” कहते हुए एक-दूसरे को कुहनियाँ मारते हुए वे दोनों हँसने लगे।

उन दोनों के भद्दे व्यवहार और गन्दी बातें सुनकर गौन्या का दिल धड़कने लगा। ये लोग और भी कुछ बदतमीज़ी कर सकते हैं। शायद मुझे मार भी सकते हैं। कुछ भी कर सकते हैं। पता नहीं, माँ के ऊपर भी हाथ उठाएँगे। गौन्या डर गया। उसे एकदम असहाय-सी अनुभूति होने लगी। सवेरे सीता के मैदान में चलते वक़्त उसके रोंगटे खड़े हो गए थे। वैसा ही उसे महसूस होने लगा। उसी वक़्त इन्दिरा के शब्द उसे सुनाई पड़े।

“हाँ रे बाबा, हाँ चोली के ही, तेरी माँ की चोली के हैं ये आम। ठीक से अपनी माँ के आम दबाकर ले जा।”

इन्दिरा के ऐसे शब्द सुनकर शराबी पीछे हटे।

“माँ की चोली के आम। हमारी माँ के बारे में बोलती है साली। माँ की चोली। ख़बरदार, हमारी माँ क्या?” ऐसा कुछ बड़बड़ाते हुए दोनों उठे और पूँछ दबाए कुत्ते की तरह काँय-काँय करते, लड़खड़ाते से चले गए।

अवाक होकर गौन्या अपनी माँ की तरफ़ देख रहा था। माँ की चोली, सीता की चोली, एक क्षण में शब्द का अर्थ बदल गया और उसे आश्चर्य होने लगा। विकट दो-तीन दिन से उसने जिन शब्दों की आरी को कर-कर करते हुए अपनी गर्दन पर घूमते देखा था, उन्हीं शब्दों की धार माँ ने घिसकर कुन्द कर दी, बिना क्रोध और शोर शराबे और शान्ति के साथ। इसी शब्द को लेकर शिक्षिका ने कितना शोर मचाया था।

गौन्या अपनी माँ की ओर देख रहा था। नरम दिखनेवाली उसकी माँ कुछ अलग ही नज़र आ रही थी। माँ के अन्दर आम की गुठली की तरह एक कड़ा मज़बूत कवच है – ऐसा उसे लगने लगा। देखते-देखते वह कवच बड़ा होने लगा। एकदम बड़ा… सीता के मैदान को अपने आलिंगन में लेने वाले आकाश के जितना विशाल।

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