एक को कहते सुना—
हम तो हैं ब्राह्मण
हमें है मालूम
कहाँ, किधर, किस दिशा में
हैं देखते भगवन
हमारी ही है ठेकेदारी
हमारे ही हैं देवता
और हमारी ही देवनारी।

एक को कहते सुना—
हम हैं मुसलमाँ
पर ऊँची जात के
हमारे हैं मित्र अनेक प्रकार
पाण्डे, गुप्ता और चमार।

एक को कहते सुना—
जातिवाद की लड़ाई हमारी डोर
नारी नहीं होती हैं कमज़ोर
लगाती हैं पूरा ज़ोर
सम्भालती हैं घरों की बागडोर
उनकी आवाज़ ने मचाया है
राज करने वालों के कानों में शोर
पर हम पुरुष ही करते हैं
उनकी रक्षा
और तय करते हैं
औरतों के चाल-चलन की सीमा व छोर।

एक को कहते सुना—
हम ऐसे परिवार से आते हैं
जहाँ डोमिन, चमाईन ही हैं
हमको पाले
हम कर नहीं सकते कोई भेद
अगले ही क्षण थे उनके भाव
हरगिज़ नहीं ब्याह सकते अपने को किसी ग़ैर-मज़हबी से
सम्भव नहीं बनाना परिवार एक अन्य समाज में।

एक को कहते सुना—
एकजुटता और समभाव ही
है हमारा एकमात्र नारा
पर जब खाना खा
फेंकी प्लेटें और हड्डियाँ
उस जूठे को अपने हाथों से साफ़ करती
पायी गई करती अपना गुज़ारा
एक अकेली मेहतरा।

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