निज वैभव के बल से तुमने—
कह दो,
क्या यह नहीं किया है?

मानव से मैला ढुलवाकर
उसे पशु से हीन समझकर
तिरस्कार कर नित ठुकराकर
क्या अछूत तक नहीं कहा है?

जाड़े कँपते
लू में तपते
वर्षा भीगते
किसानों के खलिहानों का
उठा अनाज सारा का सारा
उन्हें फिरा कर मारा-मारा
नहीं अन्न मोहताज़ किया है?

कठोर श्रम से वे बेचारे
उत्पादन का ढेर लगाते
कर निर्यात विदेशों तक में
तुम मनचाहा लाभ कमाते
उनको रख अधभूखा-नंगा
श्रम का शोषण नहीं किया है?

अब्दुल मलिक ख़ान की कविता 'बस इतना'

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