निज वैभव के बल से तुमने-
कह दो,
क्या यह नहीं किया है?

मानव से मैला ढुलवा कर
उसे पशु से हीन समझ कर
तिरस्कार कर नित ठुकरा कर
क्या अछूत तक नहीं कहा है?

जाड़े कँपते
लू में तपते
वर्षा भीगते
किसानों के खलिहानों का
उठा अनाज सारा का सारा
उन्हें फिरा कर मारा-मारा
नहीं अन्न मोहताज किया है?

कठोर श्रम से वे बेचारे
उत्पादन का ढेर लगाते
कर निर्यात विदेशों तक में
तुम मनचाहा लाभ कमाते
उनको रख अधभूखा-नंगा
श्रम का शोषण नहीं किया है?

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