मुझे आज अलस्सुबह
पुराने दस्तावेज़ों के बीच
एक ज़र्द काग़ज़ मिला,
दर्ज थी उस पर
सब्ज़ रंग की आधी-अधूरी इबारत
वह प्रेमपगी कविता नहीं थी, शायद
या हो, क्या पता
मेरा वजूद चन्दन सा महकने लगा।

एक के बाद एक
तरह-तरह की चीज़ें मिलती गयीं,
खोए-पाए का सिलसिला चला,
धूल में अंटी बाँसुरी मिली,
उसके नीचे दबी थी स्वरलिपि
फूँक से गर्द को बुहारा
स्मृति के वर्षावन में बज उठी अचीन्ही सिम्फनी

गुलेल मिली तो उसे उठा
छुपा लिया अपनी पीठ के पीछे,
मरी हुई चिड़िया के रक्त सने पंख मिले
उसे उठा डायरी में दबा लिया,
आदिम क्रूरताएँ काग़ज़ी क़ब्रगाहों में पनाह पाती हैं
कुल मिलाकर आज जो कुछ मिला
वह तो कभी खोया ही न था

आँगन में लगे गुलमोहर के लाल फूल
देर तक खोजे तो न मिले,
वह रूठकर अलविदा हुआ
ले गया सारे रंग अपने साथ,
सूखी हुई पत्तियाँ मिलीं
उन्हें बटोरकर हथेली पर रखा,
एक दिन ये उड़ेंगे
सूखे हुए ठूँठ के इर्दगिर्द
बहुरंगी तितलियाँ बनकर

अलस्सुबह ख़ुद को ख़ूब तलाशा
मैं तो नहीं हुआ बरामद
मिले मेरे होने के अपुष्ट सुबूत
यत्र-तत्र बिखरे हुए
मुड़ी-तुड़ी जंग खायी चाबियों के गुच्छे की तरह
ताले को लेकर कोई उत्सुकता नहीं
वह हो तो क्या, न हो तो भी…

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निर्मल गुप्त
बंगाल में जन्म ,रहना सहना उत्तर प्रदेश के मेरठ में . व्यंग्य लेखन भी .अब तक कविता की दो किताबें -मैं ज़रा जल्दी में हूँ और वक्त का अजायबघर छप चुकी हैं . दो व्यंग्य लेखों के संकलन इस बहुरुपिया समय में तथा हैंगर में टंगा एंगर प्रकाशित. कुछ कहानियों और कविताओं का अंग्रेजी तथा अन्य भाषाओं में अनुवाद . सम्पर्क : [email protected]

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