अगर सिगरेट के कश गिनकर लिखता मैं कविता
महज चार महीनों में
लिख चुका होता एक ग्रंथ, सोलह महाकाव्य, इक्यानवे किताबें और
पिछले साल अक्टूबर से दिसंबर तक
हर दिन की होती चालीस कविताएँ
उन बहत्तर प्रेमिकाओं के नाम
जिन्हें मैंने बारी बारी से माचिस की डिबिया की तरह खोला और सिगरेट की तरह मुँह से लगाया था

उन दिनों मुझे हर उस शख़्स से मोहब्बत थी जो मेरे धुएँ में गुज़ार रहा था अपना जीवन
साथ ही वैसी लड़कियाँ जो बनाती थीं छल्ले मगर प्रेम का छल नहीं रचती
जिनके भीतर से निकली सेक्स की चाह सिगरेट से निकले धुएँ की तरह स्वाभाविक थी

मैं बहुत संजीदगी से सुनता उस लड़की की बातें
जो मुझे मंटो और चार्ल्स बुकोव्स्की की किताबों के किसी अल्हड़ – बेबाक – बेपरवाह और ज़िंदा किरदार सी लगती
जिसने कभी कड़ाके की ठण्ड में मुझसे बाँटते हुए बिस्तर कहा था
“तुम्हें छोड़ देनी चाहिए सिगरेट”
मुझे उसकी इस बात के अलावा सिर्फ़ उसका खुलना याद है
खुलना कितना मार्मिक होता है
और
इस क्रिया को देखना कितना हृदयस्पर्शी

काश! उस रात मैं भी खुल पाता
उसकी तरह
और रख पाता अपनी ठण्डी आत्मा उसकी गर्म हथेलियों में
जैसे रख गई वो ख़ुद को मेरे ओंठों के बीचोबीच जलता हुआ कभी ना बुझने वाले सिगरेट की तरह!

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