‘कितनी मूंग दलेगें आखिर?’ – विजय ‘गुंजन’

कितनी मूंग दलेगें आखिर,
हम इस धरा की छाती पर?
अनियंत्रित आबादी के पांव तले
वसुंधरा की छाती पर

जंगलों में है पसरा मातम,
देख विटपों की लाशों को
कौन संभालेगा आकर अब
उखड़ती जीव जंतु की साँसों को
स्वार्थ ने इंसानों के,
जलायी चिता हरियाली की
ओजोन परत में करके छेद,
बिगाड़ी सूरत सूरज की लाली की
चल रहे सब लोग यहाँ अब
भोग विलास की परिपाटी पर,
कितनी मूंग दलेगें आखिर,
हम इस धरा की छाती पर?

प्यास से व्याकुल सरिताओं का
नीर हो चुका काला है
सरीसृपों के आंगन में भी
अब आता नहीं उजाला है
तालाबों के ह्रदय में चुभते
अनगिनत प्रदूषणों के शूल
सावन में भी है तपती भूमि
बादल रस्ता अब जाते भूल
पंक्षियों के कलरव का स्वर
सुर से होकर टूटा है
बस्तियां बसाने के खातिर
हर उपवन को लूटा है
दाग गहरे लगा दिए सबने
अपनी वन सम्पदा की थाती पर
कितनी मूंग दलेगें आखिर,
हम इस धरा की छाती पर?

सजा भी देगी यह जननी
मत भूलो ए मतलबी इंसान
भूकंप, बाढ़, सुनामी जैसे
हैं कठोर उसके दंड विधान
आसुओं के समंदर में
अब जगत को डूबना ही होगा
कुदरत के कहर से
पल दर पल जूझना ही होगा
प्रलय का यह मंजर कोई,
सपना नहीं हकीकत है
गिरगिटी दुनिया की अभी
नहीं बदलने वाली नीयत है
जाएगा लेट मृत्यु लोक का शव
तब जीवन की एक खाटी पर
कितनी मूंग दलेगें आखिर,
हम इस धरा की छाती पर?

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चित्र श्रेय: Thomas Lambert

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विजय ‘गुंजन’
डॉ विजय श्रीवास्तव लवली प्रोफेशनल यूनिवसिर्टी में अर्थशास्त्र विभाग में सहायक आचार्य है। आप गांधीवादी विचारों में शोध की गहन रूचि रखते हैं और कई मंचों पर गांधीवादी विचारों पर अपने मत रख चुके हैं। आपकी रूचि असमानता और विभेदीकरण पर कार्य करने की है। हिन्दी लेखन में विशेष रूचि रखते हैं और गीत, हाइकु और लघु कथा इत्यादि विधाओं में लिखते रहते हैं। विजय का 'तारों की परछाइयां' काव्य संग्रह शीघ्र प्रकाशित होने वाला है | विजय फगवाड़ा पंजाब में रहते हैं और उनसे [email protected] पर सम्पर्क किया जा सकता है।