बन गई रात उजेरी, दिन हो गए पलाश।
कर पवन संग मिताई, चला गया मधुमास

दरपित रवि से रूठ धरा, घन से करे गुहार।
मुखमंडल झुलसाएँ, इनका करो सुधार॥

गुलमोहर ने ठान ली, दोपहरी से रार।
गेरुआ घूँघट काढ़े, हो गइ साँझ बहार॥

इठलाय एक बावरा, अमराई घन गात
जी! लो बन चला रसाल, खट्टे करके दाँत॥

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नम्रता श्रीवास्तव
अध्यापिका, एक कहानी संग्रह-'ज़िन्दगी- वाटर कलर से हेयर कलर तक' तथा एक कविता संग्रह 'कविता!तुम, मैं और........... प्रकाशित।

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