मैं नहीं चाहता

‘Main Nahi Chahta’, a poem by Amar Dalpura

मैं नहीं चाहता
सूरज निकलते ही दुनिया के शोर में
चिड़ियों की चहक मर जाए।

सभी पक्षी
सुबह का स्वागत करते हैं
औरतें धरती को साफ़ करती है
जैसे सूरज के चेहरे पर झाड़ू मारती हों।

सुबह तब होती है
जब कच्चे रास्तों से
पथरीली राहों को पार करते हुए
देश का हर बच्चा स्कूल जाता है।

सबसे रोशनी भरी सुबह वह होती है
जब सूरज किताबों में उगता है

सबसे भरोसेमंद हाथ वह होते हैं
जिसकी अँगुली पकड़कर बच्चे
चौराहें पार करते हैं।

मैं नहीं चाहता
घर से निकलूँ
और दुनिया के तमाम रास्तों पर
आवाज़ों पर पहरा हो।

मैं चाहता हूँ
सबके हिस्से में उजाला इस तरह आए
जैसे हर घर में चूल्हे जल रहे हों…

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