शान्त मौन ठहरा सा
जड़, प्राणहीन काला लिबास
डब्बे में बन्द
केवल शरीर
लोगों की भीड़
धीरे धीरे सरकती
फुसफुसाती, इशारों में बढ़ती
अन्तिम यात्रा

शास्त्रों का भार
रटी हुई पंक्तियाँ
यन्त्रवत विलाप
मसानी बैराग फिर से सर पर आ बैठा है
दबाता दबोचता
जैसे ज़िन्दा ही गाढ़ डालेगा
यहीं इसी मिट्टी में
मृत्यु की सत्ता में विश्वास बढ़ता सा जा रहा है
श्वेत फूलों का अम्बार
अनगिनत मुट्ठियों में मिट्टी
मृत्यु संगीत बजाता स्पीकर
अब बन्द हो गया है
संसारी झोले उठाये अब लौटते क़दम
निष्प्राण शरीर और बैराग
दोनों मिट्टी के हवाले।

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