मौत कभी ख़त्म नहीं होती

‘Maut Kabhi Khatm Nahi Hoti’, a poem by Pratima Singh

मौत ज़िन्दा रहती है हमेशा
मोर्चरी के बाहर पहरा देते
दढ़ियल की आँखों में,
उसे फ़र्क़ नहीं पड़ता
कौन आया है इस बार,
न दर्द होता है, न काँपता है वो,
उसे दिखती हैं घड़ी की सुइयों में
अधजगे बच्चे की आँखें,
सुनायी देती है मौत की पीठ पर
रोटियाँ बेलती चूड़ियों की खनक,
महीने की शुरुआत में गर्म गोश्त,
अन्त तक ठण्डी रोटियाँ,
नीम-सी ख़ुमारी आधी बोतल के बाद,
फिर मौत-सी गहरी नींद।
मौत ज़िन्दा रहती है हमेशा
मौत के बाद भी,
किसी न किसी के हिस्से में…
मौत कभी ख़त्म नहीं होती।