आज की रात और बाक़ी है

कल तो जाना ही है सफ़र पे मुझे
ज़िंदगी मुंतज़िर है मुँह फाड़े
ज़िंदगी ख़ाक ओ ख़ून में लुथड़ी
आँख में शोला-हा-ए-तुंद लिए

दो घड़ी ख़ुद को शादमाँ कर लें
आज की रात और बाक़ी है

चलने ही को है इक सुमूम अभी
रक़्स-फ़रमा है रूह-ए-बर्बादी
बरबरियत के कारवानों से
ज़लज़ले में है सीना-ए-गीती

ज़ौक़-ए-पिन्हाँ को कामराँ कर लें
आज की रात और बाक़ी है

एक पैमान-ए-मय-ए-सरजोश
लुत्फ़-ए-गुफ़्तार गर्मी-ए-आग़ोश
बोसे इस दर्जा आतिशीं बोसे
फूँक डालें जो मेरी किश्त-ए-होश

रूह यख़-बस्ता है तपाँ कर लें
आज की रात और बाक़ी है

एक दो और साग़र-ए-सरशार
फिर तो होना ही है मुझे होशियार
छेड़ना ही है साज़-ए-ज़ीस्त मुझे
आग बरसाएँगे लब-ए-गुफ़्तार

कुछ तबीअत तो हम रवाँ कर लें
आज की रात और बाक़ी है

फिर कहाँ ये हसीं सुहानी रात
ये फ़राग़त ये कैफ़ के लम्हात
कुछ तो आसूदगी-ए-ज़ौक़-ए-निहाँ
कुछ तो तस्कीन-ए-शोरिश-ए-जज़्बात

आज की रात जावेदाँ कर लें
आज की रात और आज की रात

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मजाज़ लखनवी
मजाज़ लखनवी (पूरा नाम: असरार उल हक़ 'मजाज़', जन्म: 19 अक्तूबर, 1911, बाराबंकी, उत्तर प्रदेश; मृत्यु: 5 दिसम्बर, 1955) प्रसिद्ध शायर थे। उन्हें तरक्की पसन्द तहरीक और इन्कलाबी शायर भी कहा जाता है। महज 44 साल की छोटी-सी उम्र में उर्दू साहित्य के 'कीट्स' कहे जाने वाले असरार उल हक़ 'मजाज़' इस जहाँ से कूच करने से पहले अपनी उम्र से बड़ी रचनाओं की सौगात उर्दू अदब़ को दे गए शायद मजाज़ को इसलिये उर्दू शायरी का 'कीट्स' कहा जाता है, क्योंकि उनके पास अहसास-ए-इश्क व्यक्त करने का बेहतरीन लहजा़ था।

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