‘Mere Hisse Ka Itwaar’, a poem by Poonam Sonchhatra

कोई किताब उठायी
दो-चार सफ़्हे उलट-पलट कर रख दिए

टीवी पर चल रही फ़िल्म देखते-देखते
कुछ ही पलों में,
मैं अपने ख़्यालों में गुम हो रखी थी

आलमारी में बिखरे कपड़े
पूरे हफ़्ते की तरह मुझे मुँह चिढ़ाते रहे

उदास नाख़ून
ख़ूबसूरत नेलपेंट के इंतज़ार में सादा हो रखे हैं
तो बिखरे बालों की
अपनी एक अलग कहानी है

बिटिया कुछ बेहतर खाने की तलाश में ही रह गयी

मन पूरी दुनिया में डोल रहा था
और मैं
खिड़की-दरवाजे बन्द किए
अंधेरे कमरे में पूरी दोपहर
बिस्तर पर करवटें बदलती रही

ये वही था
जिसका पूरे हफ़्ते इंतज़ार किया था

मेरे हिस्से का
टूटा-फूटा इतवार…

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