दस का सिक्का, मोहल्ला, वक़्त

Poems: Sudhir Sharma

दस का सिक्का

बहुत दिन हुए नहीं देखा दस का सिक्का…
स्कूल के दरवाज़े पर खड़े होकर शांताराम के चने नहीं खाए,
बहुत दिन हुए आँगन के चूल्हे पर हाथ तापे
याद नहीं आख़िरी बार कब डरे थे अँधेरे से
कब झूले थे आख़िरी बार, पेड़ की डाली पर
कब छोड़ा था चाँद का पीछा करना
याद नहीं, कब कह दिया सुनहरी पन्नी वाली चॉकलेट को अलविदा

कहाँ छुट गए काँच की चूड़ियों के टुकड़े
माचिस की डिबिया, चिकने पत्थरों की जागीर
कब सुना था आख़िरी बार, स्कूल की घण्टी का मीठा सुर
बहुत दिन हुए नहीं खायी अम्मा की डाँट

बसता पटककर भाग गया था खेलने
नहीं लौटा है अब तक शाम ढलने को है

मोहल्ला

ज़रा पीछे मुड़ो देखो वहाँ पच्चीस बरस पहले
मुहल्ले में पुराने, और क्या-क्या छोड़ आये हो
कई मौसम उघारे भीगते रहते हैं छज्जों पर
कोई दोपहरी नंगे पाँव दिन भर फिरती रहती है
टहलती रहती है इक रात घण्टों टूटी सड़कों पर

उसे जो मेथ्स के कुछ आई एम पी नोट्स भेजे थे
मिले उसको नहीं शायद
कोई भी हल नहीं निकला
वो गड्ढे करके आँगन में जो सब कंचे छुपाये थे, सुना है रोते-रोते दूर तक आये थे पुलिया तक

निकलते वक़्त बोला था ज़रा तुम सरसरी नज़रें घुमा लेना
कि कुछ छूटा तो गुज़रे वक़्त में लम्हों को लेने कौन आएगा…

वक़्त

पाँच छत्तीस थे घड़ी में जब
शाम की धूप वेंटिलेटर से सरकी थी,
दूर तक साये चले आए थे,
बीते मौसम को छोड़ने के लिए

दर्द बहने लगा था पलकों से,
तुमने आँखों से उतारी थी आँसुओं की नज़र,
ठण्डी कॉफ़ी में घुल गए थे जाने कितने पहर

पाँच छत्तीस हैं घड़ी में अब, शाम की धूप वेंटिलेटर से सरकी है…

वक़्त गुज़रा है मगर अब तलक नहीं बीता…

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Book by Sudhir Sharma: