तुम्हारे शहर की धरा पर
जब पहला क़दम रखूँगा मैं
तो सबसे पहले वहाँ की
हवा से मिलूँगा मैं,
नील नहीं उठा पाया था
चाँद पर ऐसा लुत्फ़
न शर्मा जी ले पाये थे
अन्तरिक्ष में यह, उफ़।

रॉकेट के बारे में सोचने वाला मैक्स
हॉट बैलून की सवारी करने वाला रोज़र
पैराशूट बनाने वाला रशेल
सबने ही सोचा तुम्हारे शहर के बारे में
मगर अपने ही आविष्कार से मारे गये
प्रेम में भी आदमी ऐसी ही मृत्यु चुनता है।

मैं आऊँगा मगर
हवा से ताल्लुक़ बनाकर आऊँगा
पगलायी हुई हवा को
समझाऊँगा अदब से
बहलाऊँगा ग़ज़ल से
एक आध कविता भी होगी
कुछ नज़्में भी सुनाऊँगा।

हवा से ख़ूब बनती है तुम्हारी
वरना छत पर जाने की इतनी भी क्या ख़ुमारी
सच बता! उन गमलों में क्या रखा है
हवा के लिए कहीं फूलों भरा
हरा नाश्ता तो नहीं रखा है!

मैं मरुस्थल का आदम
तुम गंगा किनारे की हव्वा
जलप्रलय अपने मिलन पर
अब आना तो नहीं चाहिए
मगर फिर भी तनिक भय है
ये हवा है ना तेरे शहर की
इसमें भी ग़ज़ब की लय है
मेरे आने तलक तुम इसको
मेरा नाम बता के रखना
जितनी मुहब्बत है मुझसे
उतनी ही जता के रखना।